भारतीय शेयर बाजार में रिटेल निवेशकों ने मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) के जरिए **₹1,48,714 करोड़** का रिकॉर्ड कर्ज लिया है। बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने पर यह भारी भरकम लेवरेज (leverage) एक बड़ी मुसीबत बन सकता है, जिससे 'फोर्स्ड सेलिंग' का खतरा पैदा हो गया है।
भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वाले छोटे निवेशकों ने जोखिम का एक नया स्तर छू लिया है। मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी के तहत लिया गया कर्ज अब ₹1,48,714 करोड़ के ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच चुका है। यह सुविधा निवेशकों को अपनी जेब से केवल एक छोटा हिस्सा देकर शेयर खरीदने की अनुमति देती है, जबकि बाकी का फंड ब्रोकर की ओर से उपलब्ध कराया जाता है। हालांकि, यह रणनीति मुनाफे को तो कई गुना बढ़ा सकती है, लेकिन गिरावट के समय यह निवेशकों के पूरे पोर्टफोलियो को तबाह करने की क्षमता रखती है।
मार्जिन कॉल का खतरा
इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ा जोखिम 'मार्जिन कॉल' है। जैसे ही शेयर की कीमतें एक निश्चित स्तर से नीचे आती हैं, ब्रोकर तुरंत अतिरिक्त कैश या कोलेटरल की मांग करता है। यदि निवेशक यह मांग पूरी नहीं कर पाता, तो ब्रोकर रिकवरी के लिए शेयर बेचने का हकदार हो जाता है। जब एक साथ कई निवेशकों को मार्जिन कॉल मिलती है, तो बाजार में बिकवाली का एक ऐसा सुनामी जैसा माहौल बनता है, जिससे स्टॉक की कीमतों में गिरावट और तेज हो जाती है।
ग्लोबल दबाव और चुनौतियां
यह स्थिति तब बनी है जब ग्लोबल मार्केट में भी हालात कुछ ठीक नहीं हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अक्सर इमर्जिंग मार्केट्स को एक साथ देखते हैं। अगर वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी या जियोपॉलिटिकल तनाव की वजह से FIIs अपनी पूंजी निकालते हैं, तो उसका सीधा दबाव भारतीय शेयरों पर पड़ता है। ऐसे में रिटेल निवेशकों के लिए कर्ज के बोझ के साथ बाजार की गिरावट को झेलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
निवेशकों के लिए सलाह
मौजूदा माहौल में सबसे बड़ा सबक यही है कि हाई-लेवरेज (High Leverage) से दूर रहें। अगर बाजार स्थिर या गिरता है, तो कर्ज का ब्याज आपके मुनाफे को खा जाएगा। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में पर्याप्त कैश रिजर्व रखना चाहिए ताकि बाजार में अचानक आई किसी गिरावट के समय मजबूरन शेयर न बेचने पड़ें। याद रखें, स्पेकुलेशन से बेहतर है कि उन कंपनियों पर फोकस करें जो फंडामेंटली मजबूत हैं।
