भारतीय रिटेल निवेशक अब सिर्फ 10-साल के बॉन्ड तक सीमित नहीं हैं। वे लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड में निवेश कर रहे हैं ताकि **10-साल के बेंचमार्क** की तुलना में लगभग **60 बेसिस पॉइंट** ज्यादा यील्ड हासिल कर सकें। **30-साल** के सरकारी बॉन्ड पर करीब **7.47%** का रिटर्न मिल रहा है, जबकि 10-साल के बॉन्ड पर यह लगभग **6.87%** है। हालांकि, इन बॉन्ड में लंबी अवधि के कारण ब्याज दर के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता होती है, जिससे इनकी बाजार कीमत पर असर पड़ सकता है।
लंबी अवधि के बॉन्ड में क्यों बढ़ रहा है रिटेल निवेशकों का रुझान?
रिटेल निवेशक अब फिक्स्ड इनकम में बेहतर रिटर्न की तलाश में पारंपरिक 10-साल के सरकारी सिक्योरिटीज (G-secs) से आगे बढ़कर लंबी अवधि के बॉन्ड की ओर रुख कर रहे हैं। 21 अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, 10-साल के बेंचमार्क G-sec पर जहां करीब 6.87% की यील्ड मिल रही थी, वहीं 30-साल की अवधि वाले सरकारी बॉन्ड करीब 7.47% पर ट्रेड कर रहे थे। यील्ड में यह लगभग 60 बेसिस पॉइंट का अंतर निवेशकों को आकर्षित कर रहा है।
इस बदलाव को RBI Retail Direct जैसे प्लेटफॉर्म और SEBI रजिस्टर्ड ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म्स ने और आसान बना दिया है। इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए अब आम निवेशक सीधे सेंट्रल गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (G-secs) और स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (SDLs) खरीद सकते हैं। भले ही ये सरकारी समर्थित एसेट्स हैं और इनमें क्रेडिट रिस्क लगभग न के बराबर है, लेकिन ये पूरी तरह से जोखिम-मुक्त नहीं हैं।
ब्याज दर और कीमत का जोखिम समझना जरूरी
लंबे समय के बॉन्ड में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है ब्याज दर (Interest Rate) का जोखिम। बॉन्ड की बाजार कीमत हमेशा ब्याज दरों के विपरीत दिशा में चलती है। जब बाजार में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो मौजूदा बॉन्ड का मूल्य गिर जाता है। इसका असर लंबी अवधि वाले बॉन्ड, जैसे 20 या 30-साल के इंस्ट्रूमेंट्स पर, छोटी अवधि के बॉन्ड की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। अगर कोई निवेशक इन लॉन्ग-ड्यूरेशन बॉन्ड को मैच्योरिटी से पहले बेचने का फैसला करता है, और उसी दौरान ब्याज दरें बढ़ जाती हैं, तो उसे अपनी शुरुआती निवेश राशि पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसे 'मार्क-टू-मार्केट लॉस' भी कहते हैं।
इसके अलावा, निवेशकों को 'री-इन्वेस्टमेंट रिस्क' का भी सामना करना पड़ता है। ये लॉन्ग-टर्म बॉन्ड छमाही आधार पर कूपन पेमेंट करते हैं। अगर भविष्य में बाजार की ब्याज दरें गिरती हैं, तो निवेशकों को इन कूपन पेमेंट्स को आज मिल रही आकर्षक यील्ड पर दोबारा निवेश करना मुश्किल हो सकता है।
निवेशकों के लिए रणनीतिक विचार
जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में लंबी अवधि के बॉन्ड जोड़ना चाहते हैं, उनके लिए होल्डिंग पीरियड (कितने समय तक बॉन्ड रखना है) का प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है। वित्तीय विशेषज्ञ अक्सर सलाह देते हैं कि निवेशकों को बॉन्ड की मैच्योरिटी को अपने निवेश के समय-काल से मिलाना चाहिए। इन जोखिमों से निपटने की एक आम रणनीति 'बॉन्ड लैडरिंग' है। इसमें निवेशक अपनी पूंजी को अलग-अलग मैच्योरिटी डेट वाले बॉन्ड में बांट देते हैं – जैसे 5-साल, 10-साल और 20-साल के सिक्योरिटीज। यह तरीका ब्याज दर में बदलाव के प्रभाव को कम करने में मदद करता है और कुछ हद तक लिक्विडिटी भी सुनिश्चित करता है, क्योंकि छोटी अवधि के बॉन्ड जल्दी मैच्योर हो जाते हैं।
हालांकि लंबी अवधि के G-secs आज ज्यादा यील्ड दे रहे हैं, लेकिन ये उन निवेशकों के लिए सबसे उपयुक्त हैं जो बॉन्ड को मैच्योरिटी तक रखने का इरादा रखते हैं। इससे उन्हें अस्थिर बाजार में बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। छोटे निवेश अवधि वाले या कीमत की अस्थिरता से असहज निवेशकों को छोटे-अवधि वाले डेट फंड, बैंक डिपॉजिट या सीनियर सिटिजन सेविंग स्कीम (SCSS) जैसे छोटे बचत योजनाओं पर विचार करना चाहिए, जो ब्याज दर की संवेदनशीलता के बिना निश्चित रिटर्न प्रदान करते हैं।
अगला महत्वपूर्ण कारक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा तय की जाने वाली ब्याज दरों का भविष्य का रुख होगा। चूंकि इन लंबी अवधि के बॉन्ड की कीमतें ब्याज दरों में बदलाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं, इसलिए सेंट्रल बैंक के मॉनेटरी पॉलिसी रुख में कोई भी बदलाव इन लॉन्ग-डेटेड इंस्ट्रूमेंट्स के बाजार मूल्य को सीधे प्रभावित करेगा।
