Reserve Bank of India (RBI) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय प्राइवेट सेक्टर में कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) तेजी से बढ़ रहा है। FY26 के **₹2.6 लाख करोड़** के मुकाबले, FY27 तक यह आंकड़ा **₹3.2 लाख करोड़** तक पहुंचने की उम्मीद है।
भारतीय कंपनियां फिलहाल विस्तार के एक बड़े चरण से गुजर रही हैं। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि भले ही ग्लोबल इकोनॉमी में सुस्ती के संकेत हों, लेकिन भारतीय कॉरपोरेट्स नई क्षमता (Capacity) बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
पावर और इंफ्रा पर सबसे ज्यादा दांव
इस निवेश का एक बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में जा रहा है। पावर जनरेशन, ट्रांसमिशन, और सड़क व पुल निर्माण जैसे प्रोजेक्ट्स कंपनियों की प्राथमिकता बने हुए हैं। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इन सेक्टरों में निवेश के लिए लंबी अवधि के कैपिटल की जरूरत होती है, जो कंपनियों के डेट स्ट्रक्चर (Debt Structure) पर सीधा असर डाल सकता है।
ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स और रिस्क
रिपोर्ट के मुताबिक, मंजूर किए गए प्रोजेक्ट्स में से लगभग 89% 'ग्रीनफील्ड' हैं, यानी कंपनियां जमीन से नया प्लांट तैयार कर रही हैं। यह भरोसा तो दिखाता है, लेकिन इसमें रिस्क भी ज्यादा है। नए प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ने (Cost Escalation) की संभावना हमेशा बनी रहती है, जिसका असर मुनाफे पर हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
शेयरधारकों के लिए यह स्थिति 'दोधारी तलवार' जैसी है। जहां एक ओर यह भविष्य की ग्रोथ और रेवेन्यू का संकेत है, वहीं दूसरी ओर भारी कर्ज (Debt) के कारण ब्याज का बोझ बढ़ सकता है। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के तिमाही अपडेट्स पर नजर रखें और यह देखें कि क्या प्रोजेक्ट्स तय बजट के अंदर पूरे हो रहे हैं या नहीं। ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव भी एक बड़ा फैक्टर है जिस पर नजर बनाए रखना जरूरी है।
