भारतीय फार्मा सेक्टर की 2030 के लिए बिक्री का लक्ष्य घटकर **$80-$90 बिलियन** रह गया है, जो पहले के **$130 बिलियन** के अनुमान से काफी कम है। इसका मुख्य कारण अमेरिकी व्यापार टैरिफ और मिडिल ईस्ट से शिपिंग में देरी के चलते लॉजिस्टिक्स लागत का बढ़ना है।
लक्ष्य में भारी गिरावट: क्या हैं वजह?
भारतीय दवा उद्योग ने अपने लंबे समय के विकास लक्ष्यों में बड़ा बदलाव किया है। अब सेक्टर की 2030 की बिक्री $80 बिलियन से $90 बिलियन के बीच रहने का अनुमान है, जो कि पहले तय किए गए $130 बिलियन के लक्ष्य से काफी कम है। Pharmaceuticals Export Promotion Council of India (Pharmexcil) के चेयरमैन, नमित जोशी (Namit Joshi) ने बताया है कि अमेरिका की व्यापार नीतियों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और मिडिल ईस्ट में शिपिंग में लगातार आ रही बाधाएं इस गिरावट के मुख्य कारण हैं।
एक्सपोर्ट पर बढ़ता दबाव और लॉजिस्टिक्स की मार
भारतीय फार्मा कंपनियों के एक्सपोर्ट ऑपरेशन पर सीधा असर पड़ रहा है। मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण मालवाहक जहाजों को लाल सागर (Red Sea) से बचना पड़ रहा है, जिससे यात्रा का समय बढ़ गया है और माल भाड़ा (freight costs) भी महंगा हो गया है। इन अतिरिक्त खर्चों से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बन रहा है, क्योंकि वे ग्लोबल मार्केट्स में प्रतिस्पर्धी कीमतें बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। हाल ही में, ब्राजील और यूरोप जैसे मार्केट्स से लगातार मांग के चलते भारतीय फार्मा एक्सपोर्ट में 2.13% की मामूली वृद्धि देखी गई, लेकिन कई बड़े निर्माताओं के लिए अमेरिका पर निर्भरता एक अहम फैक्टर बनी हुई है।
अमेरिकी व्यापार नीति और टैरिफ का खतरा
संयुक्त राज्य अमेरिका की व्यापार नीति इस सेक्टर के लिए एक बड़ा चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि अगस्त 2026 तक अमेरिकी जेनेरिक दवाओं के आयात पर 0% टैरिफ की दो साल की छूट है, भविष्य में टैरिफ बढ़ने की आशंका बनी हुई है। 100% से 200% तक टैरिफ लगने की संभावना ने लंबी अवधि की योजना बनाने के माहौल को सतर्क बना दिया है। यह अनिश्चितता ऐसे समय में आई है जब वित्तीय वर्ष 2025-26 में अमेरिकी बाजार में भारतीय फार्मा शिपमेंट में नरमी देखी गई है, जो पिछले साल के $10.5 बिलियन की तुलना में घटकर लगभग $9.7 बिलियन रह गया है।
भविष्य की ग्रोथ और स्ट्रेटेजी
अगले तीन वर्षों में उद्योग की ग्रोथ 6% से 10% के बीच रहने की उम्मीद है। डबल-डिजिट ग्रोथ पर लौटने के लिए सेक्टर को बायोसिमिलर (biosimilars) और कॉम्प्लेक्स पेप्टाइड्स (complex peptides) जैसे हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की ओर सफलतापूर्वक ट्रांजिशन करना होगा। हालाँकि, ऐसे इंटीग्रेटेड सप्लाई चेन का निर्माण जो इन व्यापार और लॉजिस्टिक्स की बाधाओं को दूर कर सके, एक लंबी प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि एक व्यापक अमेरिकी-आधारित मैन्युफैक्चरिंग प्रेजेंस स्थापित करने में कम से कम पांच साल लग सकते हैं, जिससे कंपनियां बीच-बीच में संभावित टैरिफ वृद्धि के प्रभाव को मैनेज करने को मजबूर होंगी।
निवेशकों को प्रमुख भारतीय फार्मा एक्सपोर्टर्स के आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, ताकि माल भाड़े की लागत के कारण मार्जिन में होने वाली कमी के संकेत मिल सकें। इसके अलावा, प्रबंधन की ओर से अमेरिकी बाजार की रणनीति, स्पेशियलिटी दवाओं की ओर उत्पाद मिश्रण में बदलाव, और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन पर किसी भी अपडेट पर कंपनी की प्रतिक्रियाएं इन सेक्टर-व्यापी दबावों के अनुकूल होने के महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।
