ग्लोबल मार्केट से मिले खराब संकेतों के कारण भारतीय बाजार दबाव में है। अगस्त के अपने पीक से Nifty 50 और Sensex **4.5%** नीचे आ चुके हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव और US में बढ़ती ब्याज दरों की आशंका ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
US बॉन्ड यील्ड का गहरा असर
बाजार की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह US की 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड का 5% के करीब पहुंचना है, जो हाल ही में 4.97% पर बंद हुई। जब अमेरिका में सुरक्षित सरकारी बॉन्ड पर 5% का रिटर्न मिलने लगे, तो विदेशी निवेशक (FIIs) उभरते बाजारों (Emerging Markets) से पैसा निकालकर US डेट में शिफ्ट होने लगते हैं। साथ ही, सितंबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना 86.5% बनी हुई है, जिससे लिक्विडिटी पर भारी दबाव है।
क्रूड ऑयल का संकट और कंपनियों के मार्जिन
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खासकर बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य (Bab al-Mandeb Strait) में जारी संघर्ष ने क्रूड ऑयल को $110 प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है। भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए कीमतों में इस उछाल से सीधे तौर पर महंगाई बढ़ने का खतरा है।
कंपनियों के लिए यह दोहरी मार है। मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर की कंपनियां कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के बोझ को पूरी तरह से ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। नतीजतन, कई कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन घटने का डर है, जिससे अब मार्केट एक्सपर्ट्स उनके P/E मल्टीपल को दोबारा परख रहे हैं।
अब निवेशकों की नजरें कहां हैं?
भले ही IPO बाजार अभी इस झटकों के बीच भी उम्मीद जगाए हुए है, लेकिन सेकेंडरी मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है। आने वाले समय में निवेशकों को मिडिल ईस्ट में कूटनीतिक घटनाक्रमों और फेडरल रिजर्व के अगले फैसलों पर बारीक नजर रखनी होगी। कंपनियों के अगले क्वार्टरली नतीजों में यह देखना सबसे अहम होगा कि वे इस हाई-कॉस्ट माहौल में अपने मुनाफे को कैसे बचाती हैं।
