12 अक्टूबर, 2026 तक भारतीय बाजारों में साल-दर-साल (YTD) लगभग **15%** की गिरावट दर्ज की गई है। इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों (FIIs) द्वारा की गई **₹4 लाख करोड़** की रिकॉर्ड बिकवाली है। हालांकि, घरेलू निवेशकों ने इस दबाव को काफी हद तक संभाला है।
भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए साल 2026 काफी चुनौतियों भरा रहा है। 12 अक्टूबर तक के आंकड़ों के अनुसार, सेंसेक्स में 15% और निफ्टी में 14% की गिरावट देखी गई है। इस साल बाजार की चाल को सबसे ज्यादा प्रभावित विदेशी निवेशकों (FIIs) की निरंतर बिकवाली ने किया है, जिन्होंने इस साल अब तक ₹4 लाख करोड़ से ज्यादा के शेयर बेचे हैं। सिर्फ अक्टूबर महीने में ही इन्होंने ₹39,779 करोड़ बाजार से निकाल लिए हैं।
घरेलू निवेशकों का मजबूत सहारा
बाजार को पूरी तरह क्रैश होने से बचाने का श्रेय घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) को जाता है। इन लोकल फंड्स ने पूरे साल में ₹6.8 लाख करोड़ की नेट खरीदारी की है। हालांकि, विदेशी निवेश की कमी के चलते बाजार में बड़ी रिकवरी अभी दूर नजर आ रही है।
वैल्युएशन और लंबी अवधि का आउटलुक
HDFC Asset Management Company और DSP Mutual Fund के जानकारों का मानना है कि यह गिरावट एक जरूरी 'रीसेट' (Reset) है। लंबी अवधि (3 से 5 साल) के निवेशकों के लिए लार्ज-कैप स्टॉक्स अब बेहतर वैल्युएशन पर मिल रहे हैं। एक्सपर्ट्स सलाह दे रहे हैं कि अब रिटर्न की उम्मीदों को घटाकर 10-12% के दायरे में रखना समझदारी है। डिफेंस और इंजीनियरिंग जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर में प्रीमियम वैल्युएशन के कारण सावधानी बरतने की जरूरत है।
मैक्रो इकोनॉमिक चुनौतियां और फोकस
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में उछाल निवेशकों के सेंटीमेंट पर दबाव डाल रहे हैं। बाजार के जानकारों का कहना है कि मैक्रो ट्रेंड्स पर दांव लगाने के बजाय, कंपनियों के अर्निंग्स क्वालिटी (Earnings Quality) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अब आने वाली तिमाही नतीजों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनियां बढ़ती लागत के बीच अपने मार्जिन को कैसे बचाती हैं। फिलहाल, मार्केट को टाइम करने के बजाय 'सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट' का रास्ता सबसे सुरक्षित माना जा रहा है।
