भारतीय शेयर बाजारों में लगातार बिकवाली का दौर जारी है। महंगे क्रूड ऑयल और बढ़ते बॉन्ड यील्ड के चलते निवेशकों का सेंटिमेंट बिगड़ा है, जिससे बाजार में भारी उठापटक देखने को मिल रही है।
भारतीय शेयर बाजार इन दिनों भारी अस्थिरता (volatility) के दौर से गुजर रहा है और प्रमुख इंडेक्स अपनी हालिया गिरावट से उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और बदलते मैक्रो-इकोनॉमिक संकेत घरेलू इक्विटी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं।
क्रूड ऑयल का असर
ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude) की कीमतें $97 प्रति बैरल के करीब मंडरा रही हैं, जो मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। भारत दुनिया का एक बड़ा तेल आयातक देश है, ऐसे में तेल की बढ़ती कीमतें न केवल सरकारी खजाने पर बोझ डालती हैं, बल्कि 'इंपोर्टेड इन्फ्लेशन' का खतरा भी बढ़ा देती हैं। इसका सीधा असर उन सेक्टरों पर पड़ रहा है जो कच्चे माल और फ्यूल पर निर्भर हैं। कंपनियों के लिए इन लागतों को ग्राहकों पर डालना मुश्किल हो रहा है, जिससे उनकी डिमांड पर असर पड़ सकता है।
बॉन्ड यील्ड और निवेशकों का रुख
ऊर्जा संकट के अलावा, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में तेजी ने भी एसेट एलोकेशन की रणनीति को बदल दिया है। चूंकि सरकारी डेट इंस्ट्रूमेंट्स बेहतर रिटर्न दे रहे हैं, इसलिए इंस्टीट्यूशनल निवेशक शेयरों से दूरी बना रहे हैं। इस 'रिस्क-ऑफ' सेंटिमेंट के कारण ही हालिया सत्रों में मार्केट इंडेक्स अपने सपोर्ट लेवल को बचाने में नाकाम रहे हैं।
अब आगे क्या?
मौजूदा माहौल में निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन लागत दबावों के बीच अपने ऑपरेटिंग मार्जिन को कैसे बनाए रखती हैं। हालांकि घरेलू जीडीपी के आंकड़े मजबूत बने हुए हैं, लेकिन मार्केट फिलहाल मैक्रो-इकोनॉमिक जोखिमों को ज्यादा तवज्जो दे रहा है। आने वाले समय में बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि क्रूड ऑयल की कीमतें कब स्थिर होती हैं और विदेशी निवेशक (FIIs) वैश्विक यील्ड में बदलाव के बीच अपनी पोजीशन में क्या बदलाव करते हैं।
