भारतीय शेयर बाजार के लिए 2026 का साल काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। विदेशी निवेशकों (FPIs) ने साल के शुरुआती नौ महीनों में ही भारतीय बाजार से **₹3 लाख करोड़** से अधिक की पूंजी निकाल ली है। ग्लोबल ब्याज दरों में बढ़ोतरी और डॉलर की मजबूती ने बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है।
भारतीय शेयर बाजार इस समय विदेशी फंड के बड़े पैमाने पर बाहर जाने (Exodus) के कारण भारी दबाव में है। आंकड़ों के मुताबिक, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने साल के पहले नौ महीनों में ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की निकासी की है। बिकवाली का यह दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है; सितंबर में ही FPIs ने ₹35,860 करोड़ के शेयर बेचे, और अक्टूबर की शुरुआत में ही ₹9,232 करोड़ की अतिरिक्त बिकवाली देखी गई है। इस निरंतर दबाव के चलते साल की शुरुआत से अब तक Sensex में 15.5% और Nifty में 14% तक की गिरावट दर्ज की गई है।\n\n### विदेशी पैसा क्यों जा रहा है?\n\nइस गिरावट के पीछे ग्लोबल कारण प्रमुख हैं। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के 5% के स्तर पर पहुंचने के कारण निवेशकों को अमेरिका में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक लग रहा है। इसके साथ ही डॉलर की मजबूती और वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) और SIP के जरिए आने वाला पैसा बाजार को सहारा देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विदेशी बिकवाली के सामने यह पर्याप्त नहीं है।\n\n### रेगुलेटरी बदलाव और सेक्टर पर असर\n\nबाजार की हलचल के बीच दो बड़े रेगुलेटरी बदलाव भी निवेशकों की नजर में हैं:\n\n* IRDAI का फैसला: इंश्योरेंस रेगुलेटर इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर बड़े बदलाव की तैयारी में है। इसका उद्देश्य मौजूदा लागत ढांचे को बदलकर पॉलिसीधारकों के हितों को प्राथमिकता देना है।\n* SEBI का नया PMS फ्रेमवर्क: सेबी ने पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के नियमों में बदलाव किया है ताकि पहुंच बढ़ सके, हालांकि इसे लेकर निवेशकों की सुरक्षा पर चर्चा तेज है।\n\n### इकोनॉमिक आउटलुक\n\nRBI अपनी महंगाई नियंत्रण की रणनीति पर कायम है, लेकिन ग्लोबल और डोमेस्टिक सप्लाई-साइड चुनौतियों के कारण महंगाई एक बड़ा रिस्क बनी हुई है। साल की आखिरी तिमाही में अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या घरेलू लिक्विडिटी इन बाहरी और रेगुलेटरी दबावों को झेलने में कामयाब हो पाएगी।
