Indian Market Stagnation: क्या सिर्फ टैक्स है बाजार की सुस्ती की वजह? समझें असली कारण

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Market Stagnation: क्या सिर्फ टैक्स है बाजार की सुस्ती की वजह? समझें असली कारण

साल 2026 में Indian equity markets सुस्ती के दौर से गुजर रहे हैं। विदेशी निवेशकों (FIIs) ने अब तक **₹3 लाख करोड़** से ज्यादा की बिकवाली की है। बाजार में चर्चा सिर्फ **12.5%** LTCG टैक्स की है, लेकिन असल दबाव US bond yields और AI सेक्टर में शिफ्ट हो रहे ग्लोबल फंड्स की वजह से है। हालांकि, रिटेल निवेशकों की SIPs इस गिरावट के खिलाफ एक मजबूत ढाल बनी हुई है।

भारतीय शेयर बाजार साल 2026 में एक लंबी सुस्ती के दौर में है, जिससे निवेशक परेशान हैं कि घरेलू मांग के बावजूद कीमतें क्यों नहीं बढ़ रही हैं। ज्यादातर बहस 12.5% लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स पर केंद्रित है, लेकिन मार्केट डेटा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। बाजार पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा की गई निकासी का है, जिन्होंने पहले नौ महीनों में ही ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश भारतीय बाजार से निकाला है।

ग्लोबल मार्केट में पूंजी का नया खेल

विदेशी बिकवाली का मुख्य कारण भारतीय टैक्स पॉलिसी नहीं, बल्कि ग्लोबल फाइनेंशियल माहौल में आया बदलाव है। ग्लोबल निवेशक इस समय 'रिस्क-ऑफ' मोड में हैं और उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित या अधिक ग्रोथ वाले एसेट्स की ओर जा रहे हैं। इसमें सबसे बड़ा फैक्टर अमेरिकी डॉलर की मजबूती और US Treasury bond yields का 5.10% से ऊपर जाना है। जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड सुरक्षित और बेहतर रिटर्न देने लगते हैं, तो वैश्विक निवेशक भारत जैसे बाजारों से पैसा खींचकर वहां लगाना पसंद करते हैं।

इसके अलावा, ग्लोबल कैपिटल का बड़ा हिस्सा AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित थीम की तरफ शिफ्ट हुआ है। इंटरनेशनल फंड्स ने नॉर्थ एशियाई बाजारों में पैसा लगाना शुरू किया है जो AI सेक्टर में आगे हैं, जिससे पोर्टफोलियो में भारत का वेटेज अपने आप कम हो गया है।

घरेलू मजबूती और आगे का जोखिम

इतनी भारी विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार धराशायी नहीं हुआ है, जिसका श्रेय Domestic Institutional Investors (DIIs) और खुदरा निवेशकों को जाता है। SIPs के जरिए आ रहा लगातार पैसा बाजार के लिए एक 'सेफ्टी नेट' का काम कर रहा है। बाजार विदेशी पैसे पर निर्भरता कम करके अब घरेलू बचत पर निर्भर हो गया है, जिसने वैल्युएशन को गिरने से बचा रखा है।

हालांकि, चुनौतियां बरकरार हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये का गिरना और वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा की कीमतों के लिए खतरा हैं। निवेशकों की नजर अब आगामी Union Budget पर है कि क्या टैक्स स्ट्रक्चर में कोई बदलाव आता है। बाजार में फिर से जान फूंकने के लिए अब कॉर्पोरेट अर्निंग्स में दमदार ग्रोथ की जरूरत है, ताकि मौजूदा वैल्युएशन को सही ठहराया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.