भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी जारी, पर ऐतिहासिक संकेत दे रहे हैं 'सावधान'

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारतीय शेयर बाज़ार में तेज़ी जारी, पर ऐतिहासिक संकेत दे रहे हैं 'सावधान'

भारतीय शेयर बाज़ारों में पिछले चार महीनों से लगातार तेज़ी बनी हुई है, जिसमें मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट में भी मजबूती दिखी है। यह निवेशकों की मजबूत भागीदारी को दर्शाता है, लेकिन 2021 के ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि ऐसी लंबी तेज़ियों के बाद अक्सर बाज़ार में गिरावट या सुस्ती देखी गई है। निवेशक इस उम्मीद को संभावित नज़दीकी मुनाफावसूली और बदलते बाज़ार के समीकरणों के बीच संतुलित कर रहे हैं।

बाज़ार की चौतरफा तेज़ी!

भारतीय इक्विटी मार्केट में पिछले चार महीनों से लगातार तेज़ी का सिलसिला जारी है, और 'एडवांस-डिक्लाइन रेशियो' (Advance-Decline Ratio) यानी बढ़त वाले शेयरों और गिरावट वाले शेयरों का अनुपात भी लगातार सुधर रहा है। यह दिखाता है कि तेज़ी सिर्फ कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बाज़ार के बड़े हिस्से में फैली हुई है। अगस्त 2026 की शुरुआत तक, S&P BSE Sensex जैसे प्रमुख इंडेक्स करीब 78,700 के स्तर पर ट्रेड कर रहे थे। इस तेज़ी में सेक्टोरल रोटेशन (Sectoral Rotation) यानी अलग-अलग सेक्टर्स में निवेश का जाना और मिड-कैप व स्मॉल-कैप शेयरों में दोबारा आई दिलचस्पी का बड़ा योगदान रहा है।

बाज़ार की सेहत का हाल

'मार्केट ब्रेथ' (Market Breadth) या बाज़ार की चौड़ाई, यह बताती है कि तेज़ी में कितने शेयरों का योगदान है। यह बाज़ार के अंदरूनी स्वास्थ्य का एक अहम पैमाना है। पिछले कुछ महीनों से 1 से ऊपर बना हुआ एडवांस-डिक्लाइन रेशियो बताता है कि निवेशकों का भरोसा सिर्फ कुछ बड़ी कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि कई अलग-अलग सेक्टर्स पर है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Domestic Institutional Investors) का लगातार निवेश और फॉरेन इन्वेस्टर्स (Foreign Investors) की बिकवाली में आई कमी ने इस भागीदारी को और बढ़ाया है। हालांकि, क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) जैसी नई ट्रेडिंग व्यवस्थाओं के कारण बाज़ार में थोड़ी अस्थिरता बनी हुई है, फिर भी IT और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर्स में बीच-बीच में तेज़ी देखने को मिल रही है।

पिछली गिरावटों का इतिहास

फिलहाल बाज़ार का सेंटिमेंट (Sentiment) मज़बूत है, लेकिन पिछले आंकड़े हमें थोड़ा रुककर सोचने पर मजबूर करते हैं। 2021 के बाद के आंकड़ों के अनुसार, ऐसे 3 मौके आए हैं जब मार्केट ब्रेथ लगातार चार महीनों या उससे ज़्यादा समय तक पॉजिटिव रही, और उसके बाद अगले तीन महीनों में प्रमुख इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई। उदाहरण के लिए, मार्च से जून 2025 तक की ऐसी ही तेज़ी के बाद, Sensex में अगले क्वार्टर में औसतन 1.3% की गिरावट आई थी। ये ऐतिहासिक पैटर्न बताते हैं कि जब बाज़ार में बहुत ज़्यादा उम्मीदें और तेज़ी दिखती है, तो वैल्यूएशन (Valuation) बढ़ सकते हैं, और बाज़ार में मुनाफावसूली का दबाव आ सकता है।

निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें

निवेशकों के लिए मौजूदा बाज़ार का माहौल एक संतुलन की स्थिति दर्शाता है। एक तरफ लगातार SIP (Systematic Investment Plan) के ज़रिए आने वाला पैसा और निवेशकों के बढ़ते हौसले से बाज़ार को मज़बूती मिल रही है, तो दूसरी तरफ ऐतिहासिक तौर पर ऐसे समय में कंसॉलिडेशन (Consolidation) यानी एक दायरे में ट्रेड करने का भी चलन रहा है। एनालिस्ट्स का कहना है कि अभी से बाज़ार में बड़ी गिरावट का अनुमान लगाना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन सावधानी बरतना ज़रूरी है। बाज़ार के लिए अगला अहम पड़ाव यह देखना होगा कि इंडेक्स अपने रजिस्टेंस लेवल (Resistance Levels) को कैसे पार करते हैं और क्या मौजूदा सेक्टोरल रोटेशन तेज़ी को बनाए रख पाता है। निवेशक कॉर्पोरेट नतीजों की क्वालिटी और मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतों पर नज़र रख सकते हैं, खासकर RBI की पॉलिसी कमेंट्री और इसका ब्याज-संवेदनशील सेक्टर्स पर असर, क्योंकि ये कारक बाज़ार की दिशा तय करने में मार्केट ब्रेथ से ज़्यादा अहम हो सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.