भारतीय निवेशक अब विदेशों में प्रॉपर्टी खरीदने को लेकर काफी उत्साहित हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में विदेशों में प्रॉपर्टी के लिए भेजी गई रकम में **64%** का बड़ा उछाल आया है और यह आंकड़ा **$528.7 मिलियन** पर पहुंच गया है। हालांकि, पोर्टफोलियो में विविधता और रेजिडेंसी पाने के लिए किया जा रहा यह निवेश कई कानूनी और टैक्स संबंधी पेचीदगियों से भरा है।
विदेशी संपत्ति में बढ़ता निवेश
भारत के रईस निवेशक अब अपनी वेल्थ का एक बड़ा हिस्सा इंटरनेशनल रियल एस्टेट में लगा रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में भारतीय निवेशकों की वेल्थ में इंटरनेशनल प्रॉपर्टी का हिस्सा 5% से बढ़कर 13% तक पहुंच चुका है। निवेशक अब केवल लग्जरी के लिए नहीं, बल्कि घरेलू मार्केट की अस्थिरता और करेंसी में गिरावट से बचने के लिए इसे एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।
क्यों बढ़ रहा है यह ट्रेंड?
इस निवेश का मुख्य कारण विदेशों में बेहतर रेंटल यील्ड (Rental Yield) और 'गोल्डन वीजा' जैसे प्रोग्राम हैं। विशेष रूप से UAE, ग्रीस, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में प्रॉपर्टी खरीदना भारतीयों की पहली पसंद बना हुआ है। अब केवल बड़े कारोबारी परिवार ही नहीं, बल्कि 35 से 50 साल के बीच के कॉरपोरेट एग्जीक्यूटिव्स भी बाजार का 30% हिस्सा संभाल रहे हैं।
रिस्क और रेगुलेटरी नियम
भले ही विदेशों में निवेश का क्रेज बढ़ा हो, लेकिन यह Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत कुल फंड ट्रांसफर का सिर्फ 1.8% है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और Foreign Exchange Management Act (FEMA) के नियमों का पालन करना अनिवार्य है। नियमों में चूक से कानूनी और वित्तीय मुश्किलें आ सकती हैं।
निवेशकों को इन तीन बड़े जोखिमों का ध्यान रखना होगा:
- टैक्स: भारत और विदेश, दोनों देशों में टैक्स नियमों के कारण जटिलता बढ़ सकती है।
- करेंसी रिस्क: यदि रुपया डॉलर या यूरो के मुकाबले मजबूत होता है, तो निवेश की वैल्यू कम हो सकती है।
- लिक्विडिटी: विदेशी प्रॉपर्टी को बेचना घरेलू एसेट्स की तुलना में काफी धीमा और महंगा काम हो सकता है।
