US ट्रेजरी यील्ड के **5.32%** पर पहुंचने और कच्चे तेल की कीमतों के **$100** के करीब मंडराने के कारण भारतीय बाजार में हलचल है। रिस्क को मैनेज करने के लिए निवेशक अब छोटे शेयरों से निकलकर सुरक्षित Large-cap शेयरों की ओर रुख कर रहे हैं, क्योंकि Nifty 50 के शेयर ऐतिहासिक औसत से सस्ते मिल रहे हैं।
ग्लोबल मार्केट के बदलते हालात भारतीय निवेशकों की स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदल रहे हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को 3.75-4% के दायरे में रखने और 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड के 5.32% तक चढ़ने से निवेशकों का रिस्क लेने का हौसला कम हुआ है। नतीजतन, पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए बड़े शेयरों का सहारा लिया जा रहा है।
वैल्युएशन का खेल
निवेशकों के इस शिफ्ट के पीछे सबसे बड़ी वजह वैल्युएशन गैप है। Nifty 50 के शेयर फिलहाल अपने लॉन्ग-पीरियड औसत वैल्युएशन से 16% नीचे ट्रेड कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट अभी भी महंगे हैं, जो अपने ऐतिहासिक औसत से क्रमशः 4% और 27% ऊपर ट्रेड कर रहे हैं। यही वजह है कि अब इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स भी सुरक्षित दांव लगाने के लिए लार्ज-कैप की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
सितंबर 2026 में Nifty 50 में 6% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई, जो मार्च 2026 के बाद का सबसे खराब प्रदर्शन है।
बाजार पर दबाव और जोखिम
बाजार पर अभी भी काफी दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल को छूने की कोशिश कर रही हैं। अगर तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो यह न केवल महंगाई बढ़ाएगा बल्कि कंपनियों के मार्जिन पर भी चोट करेगा।
इसके अलावा, बाजार की 'ब्रेडथ' (Market breadth) काफी कमजोर दिख रही है। बड़ी संख्या में शेयर अपने 50-दिन और 200-दिन के मूविंग एवरेज से नीचे फिसल गए हैं, जो बाजार में बड़े पैमाने पर बिकवाली के दबाव को दर्शाता है। आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड की स्थिरता पर बाजार की नजर बनी रहेगी, जो तय करेंगे कि मार्केट की अगली चाल क्या होगी।
