भारतीय निवेशकों का रुझान अब विदेशी बाजारों की ओर बढ़ गया है। अप्रैल-जून **2026** तिमाही में निवेशकों ने ग्लोबल स्टॉक्स में निवेश के लिए **$1.06 अरब** की राशि देश से बाहर भेजी है। घरेलू बाजार में सीमित विकल्पों के चलते निवेशक अब AI और सेमीकंडक्टर कंपनियों में दांव लगा रहे हैं।
विदेशी निवेश में रिकॉर्ड उछाल
आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में इक्विटी और डेट में निवेश के लिए विदेशी बाजारों में $1.06 अरब की पूंजी भेजी गई है। यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले दोगुना है, जो बताता है कि पोर्टफोलियो बनाने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है।
क्यों विदेश का रुख कर रहे निवेशक?
इस पैसे के विदेश जाने की मुख्य वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर सेक्टर में ग्रोथ की तलाश है। निवेशक अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान की उन बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में पैसा लगाना चाहते हैं, जो फिलहाल भारतीय शेयर बाजार (Nifty 50 और Sensex) में उपलब्ध नहीं हैं।
म्यूचुअल फंड पर पाबंदी और LRS का इस्तेमाल
SEBI ने म्यूचुअल फंड्स के लिए विदेशी निवेश पर $7 अरब की कैप लगा रखी है। कई म्यूचुअल फंड हाउस इस सीमा के चलते इंटरनेशनल फंड्स में नई सब्सक्रिप्शन लेने से रोक लगा चुके हैं। इस कारण भारतीय निवेशक अब RBI के 'लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम' (LRS) का इस्तेमाल सीधे निवेश करने के लिए कर रहे हैं।
सावधान! ये हैं जोखिम
सीधे विदेशी निवेश करने में कुछ बड़े जोखिम भी हैं:
- करेंसी रिस्क: अगर भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो निवेश की वैल्यू पर सीधा असर पड़ेगा।
- ओवर-कंसंट्रेशन: केवल टेक और सेमीकंडक्टर शेयरों में पैसा लगाने से पोर्टफोलियो ग्लोबल सेक्टर के उतार-चढ़ाव के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाता है।
- प्रशासनिक जटिलता: म्यूचुअल फंड के मुकाबले LRS के जरिए पैसा भेजना और मैनेज करना कहीं ज्यादा मुश्किल और जटिल हो सकता है।
भविष्य में, इन आउटफ्लो की रफ्तार ग्लोबल टेक स्टॉक्स के प्रदर्शन और भारतीय रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगी।
