भारतीय निवेशकों ने जून में Liberalized Remittance Scheme (LRS) के जरिए ग्लोबल इक्विटी और डेट मार्केट में रिकॉर्ड **$456.69 मिलियन** का निवेश किया है। घरेलू बाजारों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की चाहत और GIFT City की आसान शर्तों ने इस ट्रेंड को हवा दी है।
जून 2026 में, भारतीय निवेशकों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पैसे लगाने की एक नई लहर दिखाई है। Reserve Bank of India (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, इस महीने कुल $2.55 बिलियन विदेश भेजे गए, जिसमें से $456.69 मिलियन का बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर ग्लोबल इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स में गया है। यह डेटा साफ दिखाता है कि अब भारतीय निवेशक अपने पोर्टफोलियो को केवल घरेलू दायरे तक सीमित नहीं रखना चाहते।
ग्लोबल बेंचमार्क की ओर झुकाव
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह भारतीय मार्केट बनाम ग्लोबल मार्केट का परफॉर्मेंस गैप है। पिछले दो वर्षों में Nifty 50 की सुस्त चाल के मुकाबले, S&P 500 और Nasdaq 100 जैसे ग्लोबल इंडेक्स ने दमदार रिटर्न दिए हैं। निवेशक अब उन टेक दिग्गजों और वैश्विक कंपनियों का हिस्सा बनना चाहते हैं जो भारतीय शेयर बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
GIFT City का बड़ा रोल
भारत के फाइनेंशियल हब GIFT City में हुए बदलावों ने निवेश को बहुत आसान बना दिया है। पहले अंतरराष्ट्रीय फंड्स के लिए कम से कम $5,000 लगाने पड़ते थे, जो अब घटकर सिर्फ $500 रह गए हैं। इसके अलावा, GIFT City में मौजूद फंड्स पर RBI का $7 बिलियन का वह कैप (Limit) लागू नहीं होता, जो घरेलू म्यूचुअल फंड्स पर विदेशी निवेश के लिए लगा है। इससे निवेशकों के लिए बाधाएं काफी कम हो गई हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Risks)
ग्लोबल पोर्टफोलियो बनाना फायदे का सौदा हो सकता है, लेकिन इसमें छिपे जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा खतरा 'करेंसी डेप्रिसिएशन' का है। यदि भारतीय रुपया (Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो निवेश की लागत बढ़ जाएगी और रिटर्न पर असर पड़ेगा। साथ ही, ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल तनाव, अलग टैक्स नियम और विदेशी रिपोर्टिंग की औपचारिकताएं भी एक बड़ी चुनौती हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह ट्रेंड भविष्य में भी बना रहता है या घरेलू बाजार की रिकवरी इसे फिर से धीमा कर देगी।
