भारतीय परिवारों के खर्च करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। अब बजट का सिर्फ **32.82%** हिस्सा ही भोजन पर खर्च हो रहा है, जबकि **67%** बजट का रुख नॉन-फूड सामान और सर्विसेज की तरफ मुड़ गया है। प्रोटीन-युक्त आहार और बेहतर जीवनशैली की ओर बढ़ते इस रुझान को निवेशक बारीकी से ट्रैक कर रहे हैं।
बदलती आर्थिक प्राथमिकताएं
Household Consumption Expenditure Survey 2023-24 के हालिया डेटा के अनुसार, भारतीय परिवारों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। पारंपरिक स्टेपल फूड पर खर्च घटकर लगभग 32.82% रह गया है, जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं और सेवाओं (Non-food items and services) का हिस्सा बढ़कर 67% हो चुका है। यह बदलाव ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में साफ देखा जा सकता है।
डाइट में बदलाव और क्षेत्रीय अंतर
भारतीय थाली अब अनाज (Cereals) आधारित नहीं रही, बल्कि प्रोटीन, फल और सब्जियों की ओर शिफ्ट हो रही है। हालांकि, यह बदलाव पूरे देश में एक जैसा नहीं है। उदाहरण के लिए, झारखंड में परिवार अपने फूड बजट का 38.6% हिस्सा अनाज पर खर्च करते हैं, जबकि हरियाणा में दूध और डेयरी उत्पादों पर 28.6% खर्च हो रहा है। सिक्किम और ओडिशा जैसे राज्यों के बीच प्रोटीन खर्च में भी काफी बड़ा अंतर देखने को मिला है।
निवेशकों के लिए सबक
घर में मौजूद उम्रदराज लोगों और बच्चों की संख्या का भी खर्च पर बड़ा असर पड़ता है। बुजुर्गों वाले घर ताजे उत्पाद और डेयरी पर अधिक खर्च कर रहे हैं, जबकि युवा परिवारों में पैकेज्ड फूड का क्रेज बढ़ा है।
रिटेल और FMCG सेक्टर की कंपनियों के लिए यह एक 'वेक-अप कॉल' है। जो कंपनियां इन क्षेत्रीय प्राथमिकताओं और बदलते लाइफस्टाइल के अनुसार अपनी सप्लाई चेन और प्रोडक्ट स्ट्रेटजी को ढालेंगी, उन्हीं के लंबे समय में बेहतर परफॉर्म करने की उम्मीद है। निवेशकों को अब 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' (One-size-fits-all) वाली कंपनियों से बचकर उन प्लेयर्स पर नजर रखनी चाहिए जो लोकल डिमांड के हिसाब से खुद को ढालने में माहिर हैं।
