Indian Hiring Paradox: इंटरव्यू तो तेज हुए, लेकिन जॉइनिंग में क्यों लग रहा लंबा समय?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Hiring Paradox: इंटरव्यू तो तेज हुए, लेकिन जॉइनिंग में क्यों लग रहा लंबा समय?

भारत में कंपनियां इंटरव्यू प्रक्रिया को तेज कर **46** दिनों तक ले आई हैं, लेकिन लंबी नोटिस पीरियड की वजह से जॉइनिंग में भारी देरी हो रही है। खासकर AI जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर में हायरिंग टाइम बढ़कर **63** दिन हो गया है, जो कंपनियों के ऑपरेशनल ग्रोथ और रेवेन्यू के लिए जोखिम पैदा कर रहा है।

भारतीय लेबर मार्केट में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। कंपनियां भले ही उम्मीदवारों को चुनने की प्रक्रिया को तेज कर रही हैं, लेकिन ऑफर मिलने के बाद उनके दफ्तर आने का सफर काफी लंबा हो गया है। डेटा के अनुसार, FY26 में जॉब ऑफर देने का औसत समय घटकर 46 दिन रह गया है, जो पिछले साल 53 दिन था। हालांकि, लंबी नोटिस पीरियड की वजह से कैंडिडेट के जॉइन करने का समय अभी भी कम नहीं हो रहा है।

लंबी नोटिस पीरियड का असर

भारत में अधिकांश संगठन 30 से 90 दिनों की नोटिस पीरियड अनिवार्य रखते हैं। यह भर्ती के फैसले और टैलेंट की असल तैनाती के बीच एक बड़ा गैप पैदा कर रहा है। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में यह समस्या सबसे अधिक है, जहां नए कर्मचारियों को जॉइन करने में औसतन 41 से 42 दिन लग रहे हैं, जबकि घरेलू कंपनियों में यह 27 से 28 दिन है। GCCs में 36% से ज्यादा नियुक्तियों को शुरू होने में 2 महीने से ज्यादा का समय लग रहा है।

स्पेशलाइज्ड टेक रोल्स के लिए चुनौती

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में यह समस्या और भी गंभीर है। इन स्किल्स के लिए मांग में 48% की जबरदस्त उछाल के बावजूद, हायरिंग का औसत समय 38 दिन से बढ़कर 63 दिन हो गया है। जब कंपनियों को तुरंत तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है, तो 3 महीने का लंबा इंतजार उनके लिए एक बड़ी लायबिलिटी बन जाता है।

निवेशकों के लिए जोखिम और नतीजे

निवेशकों और बाजार विश्लेषकों के लिए यह एक 'हिडन ऑपरेशनल रिस्क' है। जब किसी अहम पद को भरने में 2 महीने से ज्यादा का समय लगता है, तो प्रोजेक्ट की डेडलाइन्स अक्सर आगे खिसक जाती हैं। इससे उन प्रोजेक्ट-बेस्ड बिजनेस के रेवेन्यू पर सीधा असर पड़ता है, जो तेजी से काम पूरा करने पर निर्भर हैं।

इसके अलावा, ऑफर और जॉइनिंग के बीच के इस लंबे समय में 'कैंडिडेट ड्रॉप-ऑफ' का रिस्क बढ़ जाता है। इस दौरान प्रतिस्पर्धी कंपनियां अक्सर बेहतर ऑफर देकर टैलेंट को खींच लेती हैं, जिससे जॉइनिंग से पहले ही एट्रिशन रेट बढ़ जाता है। आने वाले समय में, कंपनियां इस हायरिंग साइकिल को कैसे मैनेज करती हैं, यह उनके स्केल करने की क्षमता पर गहरा असर डालेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.