कॉर्पोरेट जगत में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्वे के मुताबिक, करीब **70%** भारतीय कंपनियां अब महानगरों के बजाय टियर-II और टियर-III शहरों में अपना वर्कफोर्स बढ़ा रही हैं। निवेशकों के लिए यह प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
भारत की दिग्गज कंपनियां अब अपनी रिक्रूटमेंट स्ट्रैटेजी को मेट्रो शहरों से शिफ्ट कर छोटे शहरों की ओर ले जा रही हैं। Genius HRTech Limited द्वारा 1,729 नियोक्ताओं के बीच किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि पिछले दो वर्षों में लगभग 69% कंपनियों ने इन छोटे शहरों में अपनी भर्ती 30% से ज्यादा बढ़ा दी है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह फाइनेंशियल एफिशिएंसी है। सर्वे में शामिल 39% नियोक्ताओं ने माना कि छोटे शहरों में काम करने से उन्हें लागत में बड़ा फायदा मिल रहा है। महानगरों में एट्रिशन रेट (कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर) बहुत ज्यादा होती है, जिससे रिक्रूटमेंट और ट्रेनिंग का खर्च बढ़ जाता है। इन शहरों में कम टर्नओवर का सीधा असर कंपनी के ऑपरेशनल स्टेबिलिटी और मुनाफे पर पड़ेगा।
किन सेक्टरों में है फोकस?
मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग सेक्टर इस विस्तार की कमान संभाल रहे हैं। अनुमान है कि अगले 3 वर्षों में इन सेक्टर्स में छोटे शहरों के भीतर नौकरियों के सबसे ज्यादा अवसर पैदा होंगे। कंपनियां अब अपने मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स को लॉजिस्टिक्स हब और कच्चे माल के स्रोतों के करीब ला रही हैं, ताकि सप्लाई चेन को और भी ज्यादा ऑप्टिमाइज किया जा सके।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Operational Risks)
हालांकि, कहानी का दूसरा पहलू जोखिम भरा भी हो सकता है। सर्वे में शामिल 60% लोगों ने बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) और कनेक्टिविटी को विकास में बड़ी बाधा बताया है। यदि बिजली, हाई-स्पीड इंटरनेट और बेहतर लॉजिस्टिक्स की सुविधाएं नहीं सुधरीं, तो कंपनियों को ऑपरेशनल देरी और अतिरिक्त खर्च का सामना करना पड़ सकता है, जो उनके मार्जिन सुधारने के प्लान पर पानी फेर सकता है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह विकेंद्रीकरण वास्तव में मार्जिन में सुधार ला रहा है या केवल नई चुनौतियां पैदा कर रहा है।
