भारतीय कंपनियां विस्तार की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही हैं। इस फाइनेंशियल ईयर में **1,032** नई परियोजनाओं के लिए **₹4.4 लाख करोड़** का कर्ज लिया गया है। बिजनेस के लिए यह अच्छा संकेत है, लेकिन ऊंचे ब्याज और विदेशी कर्ज के जोखिम पर निवेशकों को नजर रखनी होगी।
भारतीय कॉर्पोरेट घराने अपने विस्तार की योजनाओं में तेजी ला रहे हैं। फाइनेंशियल ईयर 2026 में कुल ₹4.4 लाख करोड़ की पूंजी तैनात की गई है। Reserve Bank of India (RBI) के डेटा के अनुसार, बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 1,032 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जो पिछले साल के ₹3.7 लाख करोड़ के मुकाबले काफी अधिक है।
फंड जुटाने की दोहरी रणनीति
कंपनियां विकास को रफ्तार देने के लिए कई स्रोतों का इस्तेमाल कर रही हैं। घरेलू बैंक क्रेडिट के अलावा, 509 प्राइवेट कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख किया है और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) के जरिए ₹1 लाख करोड़ जुटाए हैं। यह दर्शाता है कि कंपनियां कर्ज की लागत की परवाह किए बिना अपनी ऑपरेशंस को बड़ा करने पर फोकस कर रही हैं।
बड़े प्रोजेक्ट्स पर दांव
इस इन्वेस्टमेंट साइकिल का एक बड़ा बदलाव 'बड़े वेंचर्स' पर फोकस है। इस साल 112 मेगा और लार्ज-स्केल प्रोजेक्ट्स ने कुल निवेश का एक बड़ा हिस्सा हासिल किया है। इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर इस निवेश का मुख्य इंजन बना हुआ है, जिसमें कुल फंड का 54.2% हिस्सा लगा है। खासतौर पर पावर और रोड कंस्ट्रक्शन सेक्टर सबसे आगे हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को कुछ खास बातों पर नजर रखनी चाहिए:
- करेंसी रिस्क: अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुटाए गए ₹1 लाख करोड़ के कर्ज पर रुपये के उतार-चढ़ाव का सीधा असर पड़ेगा। अगर रुपया कमजोर होता है, तो कर्ज चुकाने की लागत बढ़ जाएगी, जिससे कंपनियों का प्रॉफिट घट सकता है।
- एग्जीक्यूशन रिस्क: बड़े प्रोजेक्ट्स में अक्सर लैंड एक्विजिशन और रेगुलेटरी क्लियरेंस के कारण देरी होती है।
निवेशकों के लिए असली टेस्ट यह होगा कि कंपनियां इन नई संपत्तियों से ब्याज भुगतान के बोझ को सहते हुए समय पर कैश फ्लो जेनरेट कर पाती हैं या नहीं।
