रुपये में जारी भारी गिरावट और अनिश्चितता के बीच भारतीय आयातकों ने सितंबर 2026 में **$77 अरब** के रिकॉर्ड करेंसी फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट बुक किए हैं, जो कॉर्पोरेट जगत में बढ़ती चिंता को दर्शाता है।
रुपये की कमजोरी का असर
भारतीय रुपया इस साल लगभग 6.5% कमजोर होकर 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। जनवरी से सितंबर 2026 के बीच आयातकों ने कुल $576.6 अरब के कॉन्ट्रैक्ट्स लॉक किए हैं, जबकि निर्यातकों का आंकड़ा केवल $305.6 अरब रहा है। यह अंतर साफ बताता है कि कंपनियां करेंसी में और गिरावट के जोखिम को लेकर कितनी सतर्क हैं।
क्यों बढ़ रही है हेजिंग की लागत?
कॉर्पोरेट जगत पर दबाव के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $102 से $104 प्रति बैरल के बीच बनी हुई हैं, जिससे आयात बिल बढ़ रहा है। दूसरा, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 25 बेसिस पॉइंट्स की ब्याज दर बढ़ोतरी और लिक्विडिटी मैनेजमेंट के कारण फॉरवर्ड प्रीमियम महंगे हो गए हैं। हेजिंग की यह बढ़ती लागत सीधे तौर पर कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर रही है।
अलग-अलग सेक्टर, अलग रणनीति
- फार्मा सेक्टर: Aurobindo Pharma जैसी कंपनियां, जो कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं, रुपये की कमजोरी के बावजूद बढ़े हुए फ्रेट और रॉ मटेरियल खर्चों के कारण अपनी हेजिंग को और अधिक 'डिफेंसिव' बनाए हुए हैं।
- IT सेक्टर: इसके उलट, Tech Mahindra ने अपनी हेजिंग बुक को $1.96 अरब से घटाकर महज $750 मिलियन कर दिया है। ये कंपनियां अब छोटी अवधि के दांव लगा रही हैं, जो उन्हें स्पॉट एक्सचेंज रेट्स के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है, लेकिन साथ ही जोखिम भी बढ़ाता है।
निवेशकों के लिए सबक
आने वाले समय में, निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो करेंसी उतार-चढ़ाव को संभालने में सक्षम हैं। Haldia Petrochemicals जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के प्लेयर्स पर सप्लाई चेन के दबाव का असर हो सकता है। अब निवेशकों को कंपनियों की मैनेजमेंट कमेंट्री में यह देखना होगा कि वे इन बढ़ते इनपुट कॉस्ट और हेजिंग के खर्च को कैसे मैनेज कर रही हैं।
