Indian Firms और Labour Codes: अनुपालन की नई चुनौती, बढ़ रहा है कंपनियों पर ऑपरेशनल खर्च

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Firms और Labour Codes: अनुपालन की नई चुनौती, बढ़ रहा है कंपनियों पर ऑपरेशनल खर्च

भारत में नए लेबर कोड लागू होने के **10 महीने** बाद भी कंपनियां पेरोल और एचआर सिस्टम को सेट करने में जूझ रही हैं। वेतन (Wages) की परिभाषा और राज्यों के अलग-अलग नियमों के कारण कंपनियों को भारी खर्च और तकनीकी सुधारों का सामना करना पड़ रहा है।

भारत के लेबर कोड्स में बदलाव का दौर कॉर्पोरेट इंडिया के लिए एक बड़ी पहेली बन गया है। कानून लागू हुए 10 महीने बीत चुके हैं, लेकिन ज्यादातर कंपनियां अभी भी इन नियमों को जमीनी स्तर पर उतारने में संघर्ष कर रही हैं। सबसे बड़ी चुनौती 'वेतन' (Wages) की परिभाषा को लेकर है। प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी और सालाना बोनस जैसी स्टैचुटरी पेमेंट्स सीधे सैलरी स्ट्रक्चर से जुड़ी होती हैं, इसलिए वेतन की नई परिभाषा के कारण कंपनियों को अपने पेरोल और अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर में बड़े बदलाव करने पड़ रहे हैं।

अनुपालन में ऑपरेशनल चुनौतियां

नया रेगुलेटरी फ्रेमवर्क सख्त समय-सीमा तय करता है, जिसने एचआर (HR) वर्कफ्लो पर काफी दबाव डाला है। उदाहरण के तौर पर, अब कंपनी छोड़ने वाले कर्मचारियों का फुल एंड फाइनल सेटलमेंट 2 वर्किंग डेज के भीतर करना अनिवार्य है। इसके लिए मौजूदा लेगेसी इंफ्रास्ट्रक्चर नाकाफी साबित हो रहा है। इसके अलावा, वर्कप्लेस सेफ्टी और महिलाओं के लिए क्रेश (crèche) जैसी सुविधाओं के कारण कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर पर अतिरिक्त कैपिटल खर्च करना पड़ रहा है, जिससे बड़े नियोक्ताओं पर बोझ बढ़ गया है।

राज्यों के अलग-अलग नियम

यह मामला तब और पेचीदा हो जाता है जब हम भारत के फेडरल स्ट्रक्चर को देखते हैं। लेबर लॉज 'कॉन्करेंट लिस्ट' का हिस्सा हैं, इसलिए इन्हें लागू करने के लिए राज्यों को अपने नियम बनाने होते हैं। कुछ राज्यों ने अपने फ्रेमवर्क फाइनल कर लिए हैं, जबकि कई अभी भी ड्राफ्टिंग स्टेज में हैं। इस वजह से कंपनियों को देश भर में एक साथ काम करने के लिए अलग-अलग राज्यों में 'डुअल-कंप्लायंस' सिस्टम चलाना पड़ रहा है।

निवेशकों के लिए चेतावनी

निवेशकों को यह समझने की जरूरत है कि मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल और आईटी (IT) जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर में प्रशासनिक खर्च बढ़ने की संभावना है। हालांकि इन कोड्स का दीर्घकालिक लक्ष्य ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) को बढ़ाना है, लेकिन फिलहाल यह अनिश्चितता ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर डाल सकती है। आने वाली तिमाही नतीजों (Quarterly Disclosures) के दौरान यह देखना अहम होगा कि कौन सी कंपनियां इन बदलावों को बिना मार्जिन प्रभावित किए मैनेज कर पा रही हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.