भारतीय कंपनियां अब सीधे एक्सपोर्ट करने के बजाय UAE के फ्री जोन, जैसे अजमान (Ajman), में ऑपरेशनल हब बना रही हैं। CEPA के चलते व्यापार तो आसान हुआ है, लेकिन विदेशी कानूनों और टैक्स के पेचीदा नियमों का पालन करना अब निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार के अपने तरीके को पूरी तरह बदल रही हैं। अब वे केवल डायरेक्ट एक्सपोर्ट तक सीमित न रहकर UAE के फ्री जोन, जैसे अजमान फ्री जोन, में अपने ऑपरेशनल हब तैयार कर रही हैं। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य GCC, अफ्रीका और यूरोपीय बाजारों में एक मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क खड़ा करना है।\n\nइस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य आधार भारत और UAE के बीच हुआ 'कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) है, जिसने व्यापारिक रिश्तों को $100 बिलियन के लक्ष्य की ओर बढ़ाया है। इन फ्री जोन्स में डिजिटल लाइसेंसिंग और इंडस्ट्रियल पार्क जैसी सुविधाएं मिलने से कंपनियों के लिए बाजार में एंट्री आसान हो गई है।\n\n### रेगुलेटरी अनुपालन की चुनौती (Compliance Challenges)\n\nUAE में बिजनेस सेटअप करना जितना आसान दिखता है, उसके पीछे छिपे नियम उतने ही गंभीर हैं। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कंपनियां 'फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट' (FEMA) का कितना सख्ती से पालन कर रही हैं। भारतीय रेगुलेटर्स की गाइडलाइंस का उल्लंघन करने पर भारी कानूनी पेनाल्टी लग सकती है।\n\nसाथ ही, UAE में 0% कॉर्पोरेट टैक्स का फायदा हमेशा नहीं मिलता। यह टैक्स छूट 'इकोनॉमिक सब्सटेंस रिक्वायरमेंट्स' से जुड़ी है, यानी कंपनी को साबित करना होगा कि वहां वास्तव में बिजनेस हो रहा है, न कि वह केवल टैक्स बचाने का जरिया है। इसके अलावा, ग्लोबल मिनिमम टैक्स स्टैंडर्ड्स (पिलर टू) भी आने वाले समय में इन टैक्स फायदों को कम कर सकते हैं।\n\n### बैंकिंग और ऑपरेशनल जोखिम\n\nबैंकिंग सेक्टर में भी सख्ती बढ़ गई है। अब बैंकों ने एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) और KYC नियमों को बहुत कड़ा कर दिया है, जिसमें अब बिजनेस ओनरशिप का पूरा ब्यौरा देना जरूरी है। इसके अलावा, टैक्स रेजिडेंसी का 182-दिन का नियम भी अहम है। यदि मैनेजमेंट लंबे समय तक वहां रुकता है, तो भारत में टैक्स विवाद पैदा हो सकते हैं।\n\nनिवेशकों को सलाह है कि वे आने वाली अर्निंग्स कॉल्स में मैनेजमेंट की कमेंट्री पर गौर करें कि कैसे ये कंपनियां इन इंटरनेशनल एक्सपेंशन की लागत और कानूनी जरूरतों को मैनेज कर रही हैं।
