आरबीआई (RBI) की आगामी 5-7 अक्टूबर की पॉलिसी मीटिंग से पहले भारतीय कंपनियां एक्टिव हो गई हैं। बढ़ती ब्याज दरों के खतरे को देखते हुए कंपनियां करीब **$3 बिलियन** का कर्ज जुटाने में जुटी हैं ताकि पुरानी दरों पर फंड लॉक किया जा सके।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आहट
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक 5 अक्टूबर से 7 अक्टूबर, 2026 के बीच होने वाली है। बाजार में चर्चा जोर पकड़ रही है कि महंगाई और करेंसी के दबाव को कम करने के लिए आरबीआई ब्याज दरों में 25 से 50 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर सकता है। इसी अनिश्चितता के बीच कॉर्पोरेट इंडिया ने अपनी कमर कस ली है।
कंपनियों की कोशिश है कि पॉलिसी के बाद आने वाली महंगी ब्याज दरों से बचने के लिए वे अभी ही सस्ता कर्ज हासिल कर लें। इस कवायद में लगभग $3 बिलियन का फंड जुटाने की प्रक्रिया तेज हो गई है।
CRISIL का क्या है कहना?
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियां पहले के मुकाबले काफी मजबूत स्थिति में हैं। पिछले एक दशक में कंपनियों ने अपने कर्ज को कम करने (Deleveraging) पर काफी जोर दिया है। इसका फायदा यह है कि अब उनके पास इंटरेस्ट पेमेंट कवर करने के लिए मजबूत प्रॉफिट बफर मौजूद है। जानकारों का मानना है कि दरें बढ़ने के बावजूद बड़ी कंपनियों के क्रेडिट प्रोफाइल पर इसका कोई बड़ा बुरा असर नहीं पड़ेगा।
बैंकिंग सेक्टर में उतार-चढ़ाव
कॉर्पोरेट बैलेंस शीट भले ही मजबूत दिख रही हो, लेकिन बैंकिंग शेयरों में निवेशकों की सतर्कता साफ देखी जा सकती है। हालांकि, लंबे समय में ब्याज दरें बढ़ने से बैंकों की कमाई (Net Interest Margin) पर सकारात्मक असर पड़ सकता है, लेकिन शॉर्ट टर्म में लोन की डिमांड और एसेट क्वालिटी को लेकर निवेशकों के मन में संशय बना हुआ है।
आगे की चुनौतियां
बाजार पर ग्लोबल फैक्टर्स का भी भारी असर है। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण इन्फ्लेशन का खतरा बना हुआ है। यदि आरबीआई को उम्मीद से ज्यादा समय तक ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ीं, तो उन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है जो लोन पर ज्यादा निर्भर हैं। अब निवेशकों की नजर 7 अक्टूबर को होने वाली आरबीआई की कमेंट्री पर टिकी है, जिससे साफ होगा कि भविष्य में ग्रोथ का रास्ता क्या रहने वाला है।
