Indian Corporate Debt: 'Limited Liability' नियमों की बढ़ती जांच, निवेशकों की चिंता बढ़ी

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Indian Corporate Debt: 'Limited Liability' नियमों की बढ़ती जांच, निवेशकों की चिंता बढ़ी

भारत में 'लिमिटेड लायबिलिटी' का कानूनी कॉन्सेप्ट अब सवालों के घेरे में है। जटिल ग्रुप स्ट्रक्चर और प्रमोटर्स की पर्सनल गारंटी के कारण निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ गया है। IBC के तहत कर्ज वसूली की प्रक्रिया को समझना अब हर निवेशक के लिए जरूरी है।

क्या बदल रहा है गेम?

'लिमिटेड लायबिलिटी' वह सुरक्षा कवच है जो बिजनेस मालिकों को कंपनी के कर्ज के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार होने से बचाता है। लेकिन भारतीय कॉरपोरेट जगत में अब यह धारणा टेस्ट की जा रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जटिल ग्रुप स्ट्रक्चर और प्रमोटर्स की ओर से दी जाने वाली पर्सनल गारंटी कर्ज वसूली की प्रक्रिया को बेहद पेचीदा बना रही है, जो सीधे तौर पर शेयरहोल्डर्स की वेल्थ को प्रभावित करती है।

क्यों फंसता है निवेशकों का पैसा?

भारत की कई बड़ी कंपनियों में क्रॉस-होल्डिंग का एक जटिल जाल बिछा होता है। समस्या तब गहरी हो जाती है जब ये कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया यानी IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) के तहत आती हैं। अक्सर कंपनी की संपत्ति और प्रमोटर की निजी जिम्मेदारियों के बीच का फर्क धुंधला हो जाता है। इस धुंध के कारण लंबी कानूनी लड़ाई छिड़ती है, जो कर्ज के निपटारे में देरी करती है और शेयरहोल्डर्स की वैल्यू को कम कर देती है।

रिकवरी पर असर और रिस्क फैक्टर

निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता 'रिकवरी रेट' को लेकर है। जब कानून की स्थिति साफ नहीं होती, तो क्रेडिटर्स के साथ बातचीत में देरी होती है और रिकवरी उम्मीद से काफी कम हो जाती है। बाजार के पुराने अनुभव बताते हैं कि जिम्मेदारी तय न होने के कारण पूरा रीस्ट्रक्चरिंग प्रोसेस अटक जाता है, जिसका रिस्क अक्सर कंपनी की फाइनेंशियल रिपोर्ट्स में नहीं दिखता।

भविष्य की राह: गवर्नेंस है जरूरी

अब फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस भी उन कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनका स्ट्रक्चर सिंपल और ट्रांसपेरेंट है। भविष्य में जिन कंपनियों के पास बहुत ज्यादा और जटिल कर्ज है, उनके लिए फंड जुटाना महंगा और मुश्किल हो सकता है। निवेशक के तौर पर अब आपको प्रमोटर की पर्सनल गारंटी और इंटर-कंपनी लेंडिंग पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है। मार्केट अब पारदर्शिता (Transparency) और गवर्नेंस को लेकर पहले से ज्यादा सख्त हो रहा है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.