भारतीय कंपनियों ने फंड जुटाने के लिए बॉन्ड के बजाय बैंक लोन को तरजीह देना शुरू कर दिया है। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच कमर्शियल फंडिंग बढ़कर **₹17.5 लाख करोड़** तक पहुंच गई है, क्योंकि बॉन्ड यील्ड्स में बढ़ोतरी ने कंपनियों को नए विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।
FY27 के शुरुआती पांच महीनों में भारतीय कंपनियों की फंड जुटाने की रणनीति पूरी तरह बदल गई है। आंकड़ों के मुताबिक, कमर्शियल सेक्टर के लिए कुल फंडिंग 55.4% बढ़कर ₹17.5 लाख करोड़ हो गई है, जबकि नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों द्वारा बॉन्ड जारी करने का आंकड़ा पिछले साल के ₹1.5 लाख करोड़ से गिरकर महज ₹0.3 लाख करोड़ रह गया है।
कंपनियां क्यों चुन रही हैं बैंक?
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है 'कॉस्ट ऑफ बॉरोइंग'। बॉन्ड यील्ड्स ऊंचे बने हुए हैं, जिससे बॉन्ड मार्केट से पैसा जुटाना महंगा साबित हो रहा है। इसके विपरीत, बैंक लोन की मांग में उछाल आया है और नॉन-फूड बैंक क्रेडिट बढ़कर ₹9.8 लाख करोड़ हो गया है। कंपनियां फिक्स्ड कॉस्ट बॉन्ड्स की तुलना में तुरंत उपलब्ध क्रेडिट को प्राथमिकता दे रही हैं।
कौन से सेक्टर ले रहे सबसे ज्यादा कर्ज?
कर्ज की मांग हर तरफ है, लेकिन कुछ सेक्टर इसमें सबसे आगे हैं:
- मीडियम इंडस्ट्रीज: 31.8% की सालाना बढ़ोतरी।
- स्मॉल और माइक्रो इंडस्ट्रीज: 23.0% का उछाल।
- सॉफ्टवेयर सेक्टर: डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के कारण 41.8% की जबरदस्त बढ़ोतरी।
- शिपिंग सर्विस: 25.6% की वृद्धि।
- लार्ज एंटरप्राइजेज: 14.9% की बढ़ोतरी।
निवेशकों के लिए संकेत
बैंकों के लिए यह ट्रेंड लोन बुक ग्रोथ और नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) में सुधार का मौका है। लेकिन, कर्ज लेने वाली कंपनियों के लिए यह रिस्क भरा हो सकता है। बैंक लोन अक्सर फ्लोटिंग इंटरेस्ट रेट्स पर होते हैं, जो बॉन्ड्स की तुलना में ज्यादा अस्थिर होते हैं। अगर भविष्य में ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं, तो कंपनियों का ब्याज खर्च बढ़ सकता है, जो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लेटेस्ट सर्वे के अनुसार, यह मांग अभी जारी रहने की उम्मीद है। दूसरी तिमाही में लोन डिमांड का नेट रिस्पॉन्स 46.7 रहा है और उम्मीद है कि तीसरी तिमाही में भी यही तेजी बरकरार रहेगी।
