भारतीय फाइनेंस लीडर्स भविष्य को लेकर काफी उम्मीदें पाल रहे हैं। एक सर्वे के मुताबिक, **85%** CFOs का कहना है कि उनका नज़रिया पहले से ज़्यादा Positive है। लेकिन, चिंता की बात यह है कि आधे से ज़्यादा यानी **55.7%** ने माना है कि वे आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए सिर्फ 'थोड़ा' ही तैयार हैं।
रूटीन कामों में उलझे CFOs, Strategy पर फोकस कम
'ग्रांट थॉर्नटन भारत' की फाइनेंस लीडर्स बैरोमीटर सर्वे में 149 सीनियर फाइनेंस एग्जीक्यूटिव्स से बात की गई। इसमें यह बात सामने आई कि 85% CFOs का आउटलुक पिछले 6 महीनों के मुकाबले काफी सुधरा है। हालांकि, 64% फाइनेंस लीडर्स अगले साल अपने फाइनेंशियल गोल्स को लेकर कॉन्फिडेंट हैं, पर 55.7% ने माना कि वे आगे आने वाली मुश्किलों के लिए सिर्फ 'कुछ हद तक' ही तैयार हैं।
सर्वे में एक बड़ी रुकावट सामने आई है - टाइम मैनेजमेंट। करीब 48% CFOs ने कहा कि वे आज भी अपना ज़्यादातर समय रिपोर्टिंग और कंप्लायंस जैसे रोजमर्रा के ऑपरेशन्स में बिताते हैं। इसकी वजह से वे बिज़नेस स्ट्रेटेजी बनाने और ज़रूरी फैसले लेने जैसे बड़े कामों पर ध्यान नहीं दे पाते, जिसे 62% लोगों ने टॉप प्रायोरिटी बताया है।
निवेशकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि किसी कंपनी की फ्लेक्सिबिलिटी इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लीडरशिप टीम नंबरों पर नज़र रखने से आगे बढ़कर बिज़नेस मॉडल को कैसे आकार देते हैं। जब फाइनेंस लीडर्स रोजमर्रा के कामों में फंसे रहते हैं, तो कंपनी के लिए नई ग्रोथ के मौके ढूंढना या रिस्क मैनेज करना मुश्किल हो जाता है।
टेक्नोलॉजी और AI में निवेश की प्लानिंग
इस गैप को भरने के लिए फाइनेंस डिपार्टमेंट टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहे हैं। सर्वे के अनुसार, 71% CFOs टेक्नोलॉजी में इन्वेस्टमेंट बढ़ाने की प्लानिंग कर रहे हैं, जबकि 75% आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन पर ज़्यादा ध्यान देना चाहते हैं। इसका मकसद फाइनेंस फंक्शन्स को मैन्युअल और दोहराए जाने वाले कामों से हटाकर स्मार्ट, डेटा-बेस्ड इनसाइट्स की ओर ले जाना है।
हालांकि, यहां एक एग्जीक्यूशन रिस्क भी है। नई टेक्नोलॉजी को अपनाने की इच्छा तो मज़बूत है, लेकिन कंपनियों को यह पक्का करना होगा कि इन निवेशों से फायदा हो। अभी कई ऑर्गनाइजेशन AI का असरदार इस्तेमाल करने के शुरुआती दौर में हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन टेक्नोलॉजी की लागत को फाइनेंशियल डिसिप्लिन की ज़रूरत के साथ कैसे बैलेंस करती हैं।
बोर्डरूम में बढ़ता CFO का प्रभाव
CFOs की भूमिका बदल रही है, और कई लीडर्स लीडरशिप की सोच को चुनौती देने और गवर्नेंस में गहरी भागीदारी चाहते हैं। करीब 44% लोगों का मानना है कि अगर उन्हें बोर्डरूम में अपनी बात रखने या क्रिटिकल स्ट्रेटेजिक सलाह देने के ज़्यादा अधिकार मिलें तो उनका प्रभाव बढ़ेगा। अंततः, भारतीय कंपनियों का अगला कदम इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अपनी फाइनेंस टीमों को कैसे री-स्ट्रक्चर करती हैं ताकि CFOs ऑपरेशनल डिलीवरी से आगे बढ़कर बिज़नेस ग्रोथ और रेजिलिएंस के अहम ड्राइवर बन सकें।
