Indian Business Families: विरासत के कारोबार से किनारा कर रहे नए लीडर्स, फैमिली ऑफिस का क्रेज बढ़ा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Business Families: विरासत के कारोबार से किनारा कर रहे नए लीडर्स, फैमिली ऑफिस का क्रेज बढ़ा

भारत में अगली पीढ़ी के बिजनेस लीडर्स अब पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को चलाने के बजाय अपनी निजी दौलत मैनेज करने पर फोकस कर रहे हैं। 2018 के बाद से 'फैमिली ऑफिस' की संख्या में आया उछाल, देश में डील-मेकिंग के बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है।

भारतीय बिजनेस परिवारों के पैसा मैनेज करने के तरीके में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अगली पीढ़ी के कारोबारी अब अपनी खानदानी मैन्युफैक्चरिंग या ट्रेडिंग कंपनियों की कमान संभालने के बजाय 'फैमिली ऑफिस' (Family Offices) की स्थापना कर रहे हैं। यह उस पुराने मॉडल से एक बड़ा बदलाव है, जहां परिवार की पूरी दौलत केवल एक मुख्य कंपनी के प्रदर्शन पर टिकी होती थी।

तेजी से बढ़ता चलन

इस बदलाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2018 में जहां देश में ऐसे लगभग 45 प्राइवेट इन्वेस्टमेंट फर्म थे, वहीं आज इनकी संख्या 300 के पार पहुंच गई है। यह ट्रेंड अब सिर्फ अरबपतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि मिड-साइज मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल परिवार भी इसे अपना रहे हैं। वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2025 के बीच लगभग $18 बिलियन की बायआउट और कंट्रोल डील उन कंपनियों में हुई हैं, जो फाउंडर-ओन्ड थीं।

दिग्गजों की चिंता बनाम नई सोच

इस मुद्दे पर भारतीय कॉरपोरेट जगत में बहस छिड़ी हुई है। उदय कोटक जैसे दिग्गज औद्योगिक नेताओं का मानना है कि नई पीढ़ी को वास्तविक औद्योगिक उत्पादन (Industrial Output) पर ध्यान देना चाहिए। उनका तर्क है कि पैसा फाइनेंशियल मार्केट्स या प्राइवेट इक्विटी में लगाने से वैसी इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार पैदा नहीं होते, जैसे ट्रेडिशनल मैन्युफैक्चरिंग से होते हैं।

वहीं, समर्थक इसे एक जरूरी विकास मानते हैं। उनका कहना है कि प्रोफेशनल तरीके से दौलत मैनेज करने से रिस्क कम होता है, निवेश में विविधता (Diversification) आती है और इससे स्टार्टअप्स को भी जरूरी फंडिंग मिल पाती है।

निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?

बाजार पर इसका असर साफ दिख रहा है। जैसे-जैसे फाउंडर-लीड कंपनियां प्राइवेट इक्विटी या प्रोफेशनल मैनेजमेंट के हाथों में जा रही हैं, मैन्युफैक्चरिंग और रिटेल सेक्टर में कंसोलिडेशन बढ़ रहा है। निवेशकों के लिए यह ट्रैक करना जरूरी है कि क्या यह ट्रेंड ज्यादा कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट कराएगा या फिर संपत्ति बड़े प्राइवेट समूहों के पास सिमट कर रह जाएगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.