31 अगस्त 2026 को भारतीय सरकारी बॉन्ड में बड़ी गिरावट देखी गई। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे बॉन्ड यील्ड में तेजी दर्ज की गई है।
सोमवार, 31 अगस्त 2026 को भारतीय सॉवरेन बॉन्ड मार्केट में भारी दबाव देखने को मिला। बेंचमार्क 6.94% 2036 बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 6.9538% तक पहुंच गई, जो जून के बाद का सबसे उच्चतम स्तर है। बॉन्ड बाजार का नियम है कि जब यील्ड बढ़ती है, तो बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं, और यही आज सत्र के दौरान देखने को मिला।
बाजार में गिरावट के मुख्य कारण
बाजार की यह मायूसी मुख्य रूप से ग्लोबल मोर्चे से जुड़ी है। फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श (Kevin Warsh) की टिप्पणियों ने निवेशकों के बीच डर पैदा कर दिया है। फेड की ओर से महंगाई को नियंत्रित करने के सख्त रुख के कारण, सितंबर में अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़कर लगभग 60% हो गई हैं। जैसे ही अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट के एसेट कम आकर्षक हो जाते हैं क्योंकि निवेशक जोखिम के बदले बेहतर रिटर्न की मांग करते हैं।
क्रूड ऑयल का संकट
तनाव तब और बढ़ गया जब लारक द्वीप (Larak Island) के पास अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष की खबरों के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल $90 प्रति बैरल के पार निकल गया। भारत तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए ऊर्जा लागत में यह तेजी देश के ट्रेड बैलेंस और महंगाई पर सीधा असर डालती है। इससे रुपये पर भी दबाव बढ़ रहा है, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी का मैनेजमेंट और कठिन हो गया है।
RBI का रुख और आगे की राह
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पहले ही अपनी पॉलिसी में सतर्क रुख अपनाए हुए है। ग्लोबल अनिश्चितता और महंगाई के जोखिमों के बीच फिलहाल ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम दिख रही है। इस नकारात्मक माहौल का असर सिर्फ डेट मार्केट ही नहीं, बल्कि निफ्टी (Nifty) और सेंसेक्स (Sensex) जैसे इक्विटी इंडेक्स पर भी पड़ा है। अब निवेशकों की नजरें क्रूड ऑयल की कीमतों और RBI के अगले कदमों पर टिकी हैं।
