सरकार ने वित्त वर्ष 2023 से पहले की GDP बैक-सीरीज जारी करने का फैसला किया है। 2026 के अंत तक आने वाले इन आंकड़ों से देश की विकास दर की पुरानी तस्वीर और साफ होगी, जिसका सीधा असर अहम मैक्रो-इकोनॉमिक रेश्यो पर पड़ेगा।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने साल 2026 के अंत तक वित्त वर्ष 2023 से पहले की GDP बैक-सीरीज जारी करने की तैयारी शुरू कर दी है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य भारत के विकास दर मापने के पुराने आंकड़ों को नए नेशनल अकाउंट्स फ्रेमवर्क के साथ जोड़ना है, ताकि निवेशकों और अर्थशास्त्रियों को लॉन्ग-टर्म बिजनेस साइकिल को समझने में आसानी हो।
नई मेथोडोलॉजी और डेटा की बारीकियां
आने वाली बैक-सीरीज में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए 'डबल डिफ्लेशन' का इस्तेमाल होगा। पहले आउटपुट और इनपुट के लिए एक ही प्राइस इंडेक्स का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब दोनों को अलग-अलग ट्रैक किया जाएगा, जिससे ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) की गणना और सटीक होगी। इसके अलावा, ASUSE, PLFS और GST जैसे सीधे डेटासेट का उपयोग करके सरकारी अनुमानों पर निर्भरता कम की जा रही है।
नॉमिनल GDP पर असर और सेक्टर ट्रेंड्स
हालिया संशोधनों में नॉमिनल GDP में 2.7% से लेकर 3.8% तक की कमी देखी गई है। सेक्टर के हिसाब से देखें तो कृषि और फाइनेंशियल सर्विसेज के आंकड़ों में उछाल आया है, जबकि ट्रेड, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे सेक्टरों के आंकड़ों में कटौती की गई है। इस असंतुलन को ठीक करना बेहद जरूरी है, क्योंकि बिना इसके ऐतिहासिक तुलना करना मुश्किल होता है।
'डिनोमिनेटर इफेक्ट' क्यों है चिंता का विषय?
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है 'डिनोमिनेटर इफेक्ट'। चूंकि फिस्कल डेफिसिट-टू-GDP और डेट-टू-GDP जैसे रेश्यो की गणना नॉमिनल GDP के आधार पर होती है, इसलिए अगर बेस GDP नीचे आती है, तो ये अनुपात अपने आप (मैकेनिकल तरीके से) बढ़ जाते हैं। भले ही सरकार का कर्ज या कंपनियों का रेवेन्यू न बदला हो, पर इन आंकड़ों में बदलाव से बाजार की धारणा बदल सकती है।
