सरकार अब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मिलने वाली सब्सिडी को एक्सपोर्ट परफॉर्मेंस और इंपोर्ट पैरिटी से जोड़ने की योजना बना रही है। यह बड़ा बदलाव उन कंपनियों पर भारी पड़ सकता है जो लंबे समय से सरकारी मदद पर टिकी हैं।
चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) वी अनंत नागेश्वरन ने देश की इंडस्ट्रियल पॉलिसी में बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। उन्होंने साफ किया है कि अब डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मिलने वाली अनलिमिटेड सब्सिडी का दौर खत्म होने वाला है। उन्होंने ISID-IDRA कॉन्फ्रेंस में कहा कि सरकारी मदद अब केवल परफॉर्मेंस बेंचमार्क पर आधारित होगी, जिसमें मुख्य रूप से एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस और इंपोर्ट प्राइस पैरिटी को अहमियत दी जाएगी।\n\n### रणनीति में बदलाव का कारण\nसरकार का मकसद अब सिर्फ आयात घटाना नहीं, बल्कि ऐसी कंपनियों को तैयार करना है जो ग्लोबल मार्केट में अपनी दम पर टिक सकें। जियो-पॉलिटिकल अस्थिरता और सप्लाई चेन के झटकों को देखते हुए, विदेशी सामान पर निर्भरता को कम करना एक स्ट्रैटेजिक जरूरत बन गई है। सरकार अब चाहती है कि कंपनियां ग्लोबल क्वालिटी और कॉस्ट स्टैंडर्ड्स को पूरा करें।\n\n### आर्थिक आंकड़े क्या कहते हैं?\nFY 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का GVA में योगदान 14.8% पर स्थिर है। हालांकि, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही, लेकिन ट्रेड गैप चिंता का विषय बना हुआ है। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच मर्चेंडाइज इंपोर्ट में 19.7% का उछाल आया है, जो एक्सपोर्ट की रफ्तार से काफी ज्यादा है।\n\n### निवेशकों के लिए चेतावनी\nइन्वेस्टर्स के लिए यह एक संकेत है कि अब कंपनियों को नए नजरिए से परखना होगा। जो कंपनियां अपने मार्जिन के लिए पूरी तरह सरकारी प्रोटेक्शन या सब्सिडी पर निर्भर हैं, उनके लिए आने वाला समय मुश्किल हो सकता है। मार्केट अब उन कंपनियों को अलग नजर से देखेगा जो सब्सिडी को ग्लोबल एफिशिएंसी हासिल करने के लिए एक 'ब्रिज' की तरह इस्तेमाल कर रही हैं, न कि हमेशा के लिए एक 'सेफ्टी नेट' की तरह।
