Chief Economic Advisor (CEA) V Anantha Nageswaran ने चेतावनी दी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहां चुनौतियां अब डिमांड के बजाय सप्लाई-साइड से जुड़ी हैं।
1991 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव
CEA V Anantha Nageswaran का मानना है कि 2025 और 2026 का समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा 'इन्फ्लेक्शन पॉइंट' साबित हो सकता है। इसे 1991 के उदारीकरण युग के समान महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन फर्क यह है कि उस समय संकट 'बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स' का था, जबकि मौजूदा चुनौतियां जटिल 'सप्लाई-साइड' बाधाओं से पैदा हो रही हैं।
क्यों फेल हो सकते हैं पुराने तरीके?
अब तक दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं ग्रोथ बढ़ाने और महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) और फिस्कल स्टिमुलस का इस्तेमाल करती रही हैं। हालांकि, CEA ने साफ कहा है कि यह पुराना तरीका अब कम असरदार साबित हो रहा है। जब महंगाई की वजह डिमांड की कमी नहीं, बल्कि रिसोर्स की कमी और ग्लोबल ट्रेड में अस्थिरता होती है, तो सिर्फ ब्याज दरों में बदलाव से समस्या हल नहीं होती।
इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसोर्स पर दबाव
भारत के सामने अब नई तरह की स्ट्रक्चरल बाधाएं हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर्स के तेजी से विस्तार ने बिजली और पानी जैसे संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। ये समस्या केवल अस्थायी नहीं, बल्कि गहरी है, जिसके लिए सिर्फ मॉनेटरी पॉलिसी काफी नहीं है, बल्कि टारगेटेड निवेश की जरूरत है।
निवेशकों के लिए क्या हैं रिस्क?
निवेशकों को अब अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। ग्लोबल ट्रेड में हथियारों की तरह हो रहे बदलावों (Trade Weaponization) के कारण सप्लाई चेन पर खतरा बढ़ गया है। खासकर उन कंपनियों के लिए रिस्क अधिक है जो इंपोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भर हैं।
अगर महंगाई डिमांड के बजाय सप्लाई बॉटलनेक्स के कारण बनी रहती है, तो सेंट्रल बैंक के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल होगा। इसका मतलब है कि 'हायर फॉर लॉंगर' ब्याज दरों का दौर बना रह सकता है। निवेशकों को ऐसी कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो एनर्जी एफिशिएंसी, बैकवर्ड इंटीग्रेशन और लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दे रही हैं, क्योंकि आने वाले समय में सरकार की पॉलिसी इसी दिशा में केंद्रित रहने वाली है।
