सितंबर **2026** में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर **11.4%** के स्तर पर पहुंच गई है। इसकी मुख्य वजह ग्लोबल एनर्जी की बढ़ती कीमतें और प्याज-लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी है। मैन्युफैक्चरिंग इनपुट कॉस्ट में **30 महीने** की उच्चतम स्तर की तेजी से कंपनियों के मुनाफे पर भारी दबाव देखने को मिल सकता है।
भारत का होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) अगस्त के 9.9% से बढ़कर सितंबर 2026 में 11.4% पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जहां फ्यूल और खाने-पीने के सामान की महंगाई हर वर्ग की जेब पर असर डाल रही है।
एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग पर मार
थोक महंगाई बढ़ने के पीछे फ्यूल और पावर सेक्टर का बड़ा हाथ है, जहां महंगाई दर 26% तक पहुंच गई है। चालू फाइनेंशियल ईयर में क्रूड ऑयल की औसत कीमत $94.6 प्रति बैरल रही है, जबकि FY26 में यह औसत $69 था। इसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा है, जहां महंगाई 9.8% के 30 महीने के पीक पर है। बेसिक मेटल्स में 17% की बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि केमिकल, टेक्सटाइल और प्लास्टिक जैसे सेक्टर भी दोहरे अंकों में महंगाई झेल रहे हैं। निवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि कंपनियां इन लागतों को खुद झेलें या ग्राहकों पर डालें, जिसका सीधा असर मार्जिन पर पड़ेगा।
रसोई के बजट पर भारी असर
मानसून की कमी के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे खाद्य महंगाई बेलगाम हो गई है। सितंबर में प्राइमरी फूड आर्टिकल्स 8.1% महंगे हुए हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि प्याज की कीमतों में 191% और लहसुन की कीमतों में 98.7% की साल-दर-साल (YoY) तूफानी तेजी आई है। इससे आम आदमी का बजट बिगड़ा है और डिस्क्रिशनरी खर्च में कटौती होने की संभावना बढ़ गई है, जो रिटेल और FMCG कंपनियों के लिए चिंता का विषय है।
आगे का आउटलुक
ICICI Bank सहित कई फाइनेंशियल संस्थानों का मानना है कि चालू फाइनेंशियल ईयर की बाकी अवधि में भी महंगाई का स्तर ऊंचा बना रह सकता है। कमोडिटी की महंगी कीमतों और 'अनफेवरेबल बेस इफेक्ट' के कारण इसमें जल्दी गिरावट की उम्मीद कम है। अब बाजार की नजरें Reserve Bank of India पर टिकी हैं कि वे विकास और महंगाई के बीच कैसा संतुलन बनाते हैं।
