India-US Trade: टैरिफ विवाद और एनर्जी पॉलिसी से निवेशकों की बढ़ी चिंता, क्या है बड़ा रिस्क?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
India-US Trade: टैरिफ विवाद और एनर्जी पॉलिसी से निवेशकों की बढ़ी चिंता, क्या है बड़ा रिस्क?

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड रिश्तों में एक 'अजीब संतुलन' (Uneasy Equilibrium) बना हुआ है। टैरिफ विवादों और रशियन एनर्जी इंपोर्ट को लेकर बनी स्थिति से निवेशकों में अनिश्चितता है। IT और फार्मा जैसे सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में फिलहाल एक जटिल दौर चल रहा है। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर वी. अनंत नागेश्वरन ने इसे 'अजीब संतुलन' करार दिया है। दोनों देशों के बीच अंतरिम समझौते तो हुए हैं, लेकिन टैरिफ स्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोक्योरमेंट को लेकर मतभेद गहरा रहे हैं।

एनर्जी स्ट्रेटजी का रिस्क

भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से एनर्जी इंपोर्ट जारी रखे हुए है। अब चिंता यह है कि क्या अमेरिका उन देशों पर लेवी (Levy) लगा सकता है जो सेंक्शन वाले स्रोतों से एनर्जी ले रहे हैं। अगर अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है, तो भारत में कच्चा माल और एनर्जी महंगी हो सकती है, जिससे इन्फ्लेशन बढ़ेगा और एनर्जी-इंटेंसिव कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आएगा।

IT और फार्मा सेक्टर पर असर

अमेरिका भारतीय एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा बाजार है, खासकर IT और फार्मा कंपनियों के लिए। यदि अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी में प्रोटेक्शनिस्ट कदम उठाए जाते हैं, तो उन कंपनियों के शेयर में उतार-चढ़ाव दिख सकता है जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा US क्लाइंट्स से आता है। हालांकि कई कंपनियां ग्लोबल स्तर पर डाइवर्सिफाई हो चुकी हैं, लेकिन ट्रेड कॉरिडोर में कोई भी बड़ा बदलाव मटेरियल इवेंट साबित हो सकता है।

निवेशकों के लिए सलाह

सरकार अपनी 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' पर अडिग है और लंबी अवधि के आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रही है। निवेशकों को केवल हेडलाइंस पर ध्यान देने के बजाय बाइलेट्रल ट्रेड नेगोशिएशंस और US लेजिस्लेशन पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा, IT और फार्मा कंपनियों के मार्जिन पर नजर रखना भी जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि कंपनियां इन जियोपॉलिटिकल चुनौतियों को कैसे मैनेज कर रही हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.