India-US Trade Talks: भारत-अमेरिका ट्रेड डील में फंसा पेंच, IT और डिफेंस सेक्टर पर मंडराया अनिश्चितता का साया

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India-US Trade Talks: भारत-अमेरिका ट्रेड डील में फंसा पेंच, IT और डिफेंस सेक्टर पर मंडराया अनिश्चितता का साया

भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत फिलहाल ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है। रेगुलेटरी और डिजिटल फ्रेमवर्क को लेकर पैदा हुए मतभेदों ने IT, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स की चिंता बढ़ा दी है।

पिछले 18 महीनों से चल रही भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता फिलहाल एक बड़े गतिरोध (stalemate) पर पहुंच गई है। बातचीत की शुरुआत तो टैरिफ एडजस्टमेंट के साथ हुई थी, लेकिन अब यह मुद्दा भारत के इंटरनल रेगुलेटरी ढांचे, FDI नियमों, डिजिटल इकोनॉमी और टैक्स स्ट्रक्चर तक पहुंच गया है। दिल्ली इन मामलों को अपनी नीतिगत स्वायत्तता (policy autonomy) के दायरे में रखती है, जिससे सहमति बनाना मुश्किल हो रहा है।

किन सेक्टर्स पर होगी सबसे ज्यादा मार?

इस अनिश्चितता का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है जिनका बड़ा कारोबार अमेरिकी बाजार से जुड़ा है:

  • IT सेक्टर: वीजा नियमों को लेकर स्पष्टता की कमी भारतीय IT कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम है, जो सीधे तौर पर टेलेंट मोबिलिटी और प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकता है।
  • टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग: इन सेक्टर्स में एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटीज का मुद्दा बना हुआ है। भारतीय पक्ष इन शुल्कों को हटाने की मांग कर रहा है ताकि वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी बने रहें।
  • डिफेंस और सेमीकंडक्टर: F414 जेट इंजन प्रोग्राम और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर प्रगति अब राजनीतिक और व्यापारिक बातचीत के समाधान पर टिकी है।

सरकार की क्या है रणनीति?

नई दिल्ली फिलहाल किसी भी जल्दबाजी में डील करने के बजाय 'इकोनॉमिक सोवरेनिटी' (आर्थिक संप्रभुता) को प्राथमिकता दे रही है। भारत सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अगर डील होती है, तो उसे भविष्य में टैरिफ को लेकर सुरक्षा और स्थिरता मिले, ताकि अमेरिका किसी तीसरे देश को ज्यादा फायदेमंद शर्तें न दे सके।

फिलहाल, मार्केट के जानकारों की नजर इस बात पर है कि क्या दोनों देश 'फेज्ड अप्रोच' अपनाते हैं, जिसमें पहले छोटे और कम विवादित मुद्दों को सुलझाया जाए। तब तक निवेशकों को कॉमर्स मिनिस्ट्री के अपडेट्स और सेक्टर-स्पेसिफिक पॉलिसी बदलावों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.