भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक ट्रेड एग्रीमेंट लगभग फाइनल हो चुका है। अब सरकार चिली और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापारिक रिश्ते मजबूत कर रही है। निवेशकों के लिए यह खबर इसलिए बड़ी है क्योंकि भारत अब पारंपरिक IT से हटकर फिनटेक और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट पर फोकस बढ़ा रहा है।
ट्रेड डील का गणित
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड एग्रीमेंट का ढांचा लगभग तैयार है। फिलहाल दोनों देश टैरिफ स्ट्रक्चर को लेकर तालमेल बैठा रहे हैं। मुख्य चुनौती भारत के MFN (Most-Favoured-Nation) टैरिफ सिस्टम और अमेरिका के एग्जीक्यूटिव टैरिफ फ्रेमवर्क के बीच सामंजस्य बिठाना है, ताकि मौजूदा ट्रेड पॉलिसी को नुकसान पहुंचाए बिना मार्केट तक पहुंच आसान हो सके।
ग्लोबल नेटवर्क का विस्तार
भारत केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहना चाहता। अप्रैल 2026 में साइन हुआ न्यूजीलैंड के साथ ट्रेड एग्रीमेंट अक्टूबर 2026 से लागू हो जाएगा। वहीं, चिली के साथ बातचीत अगले 2-3 महीने में ठोस नतीजे दिखा सकती है। सरकार का मकसद पारंपरिक बाजारों से हटकर अपनी पहुंच बढ़ाना है।
IT से फिनटेक की ओर रुख
फिलहाल भारत के सर्विस एक्सपोर्ट में 50% हिस्सेदारी IT और ITeS की है। सरकार अब इस निर्भरता को कम कर ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज मार्केट में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है, जहां अभी भारत का शेयर केवल 1% है। सरकार UPI जैसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रमोट कर रही है ताकि क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट आसान हो सके।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
सरकार का लक्ष्य फाइनेंशियल सर्विसेज एक्सपोर्ट को $8 अरब से बढ़ाकर $60-80 अरब तक ले जाना है, जो फिनटेक कंपनियों के लिए बड़े अवसर पैदा कर सकता है। हालांकि, ग्लोबल मार्केट में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियम एक बड़ी चुनौती हैं।
इसके अलावा, निवेशकों को अमेरिकी ट्रेड पॉलिसी की अनिश्चितता और Section 301 ड्यूटी से सावधान रहना चाहिए। फिलहाल एक्सपोर्टर्स विदेशी मुद्रा के जोखिम और बढ़ते फ्रेट (freight) खर्च के दबाव में भी हैं। आने वाले समय में इन ट्रेड डील्स का क्रियान्वयन ही बाजार की अगली दिशा तय करेगा।
