वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि India-US ट्रेड डील अब फाइनल होने की कगार पर है। सरकार की रणनीति ग्लोबल GDP के 75% बाजारों तक पहुंच बनाने की है, जिसका सीधा असर स्टील, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर की कंपनियों पर पड़ेगा।
भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड डील अब निर्णायक मोड़ पर है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, डील का ढांचा लगभग तैयार है और अब अंतिम बारीकियां तय की जा रही हैं ताकि भारतीय उद्योगों को अमेरिकी बाजार में एक मजबूत कॉम्पिटिटिव एज (competitive edge) मिल सके। इस पर G20 ट्रेड मिनिस्ट्रियल मीटिंग में चर्चा होने की उम्मीद है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
ट्रेड पैक्ट्स का मकसद टैरिफ बाधाओं को कम करना और एक्सपोर्टर्स के लिए बाजार आसान बनाना है। जब ये डील पूरी होती है, तो स्टील, टेक्सटाइल, फार्मा और IT जैसे सेक्टर की कंपनियों की लागत कम होती है। हालांकि, कंपनियों के मुनाफे में कितनी बढ़ोतरी होगी, यह अंतिम संधि में तय होने वाली ड्यूटी और रियायतों पर निर्भर करेगा।
यूरोप और अन्य बाजारों की क्या है रणनीति?
सरकार केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोप में बदल रहे नियमों पर भी बारीकी से नजर रखे हुए है। उदाहरण के लिए, यूरोपियन यूनियन (EU) के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' के तहत सख्त नियम लागू हुए हैं। इसके बावजूद, भारत ने स्टील के लिए एक्सपोर्ट कोटा बढ़ाने और $500 मिलियन की क्लाइमेट फाइनेंसिंग हासिल करने में कामयाबी पाई है।
ग्लोबल नेटवर्क का विस्तार
भारत अपनी व्यापारिक पहुंच को और चौड़ा कर रहा है:
- कनाडा: ट्रेड चर्चाओं में तेजी आई है।
- GCC (Gulf Cooperation Council): अक्टूबर में अहम बातचीत प्रस्तावित है।
- मेक्सिको: टर्म्स ऑफ रेफरेंस को फाइनल कर लिया गया है।
सरकार का स्पष्ट रुख है कि किसी भी समझौते के तहत घरेलू बाजार को अनुचित प्रतिस्पर्धा या सस्ते आयात का शिकार नहीं होने दिया जाएगा। निवेशकों को अब केवल इन समझौतों पर हस्ताक्षर और आधिकारिक घोषणाओं का इंतजार करना चाहिए।
