वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal और अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव Jamieson Greer के बीच 30 सितंबर को मिलवॉकी में अहम बातचीत होने जा रही है। इस मुलाकात का मुख्य एजेंडा लंबे समय से अटकी भारत-अमेरिका ट्रेड डील है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद जरूरी है।
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटकी ट्रेड डील को फिर से गति देने की कवायद तेज हो गई है। वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal, अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) Jamieson Greer के साथ 30 सितंबर, 2026 से शुरू हो रही G20 ट्रेड मिनिस्ट्रियल मीटिंग के दौरान मिलवॉकी में चर्चा करेंगे। यह बैठक द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के भविष्य के लिए एक 'टर्निंग पॉइंट' मानी जा रही है।
डील क्यों अटकी है?
फरवरी 2026 में बनी शुरुआती रूपरेखा के बाद से ही बातचीत में सुस्ती आई है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका का बदला हुआ टैरिफ स्ट्रक्चर है। जुलाई 2026 में लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ के बाद से ही दोनों देशों को अपनी साझेदारी की शर्तों पर दोबारा विचार करना पड़ा है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन है, जहां फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में लगभग $87 बिलियन का निर्यात हुआ था, इसलिए टैरिफ से जुड़े विवादों को सुलझाना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है।
निर्यातकों की चिंता और मुकाबला
भारत का स्पष्ट लक्ष्य अपने सामान को अमेरिकी मार्केट में प्राइस-कॉम्पिटिटिव बनाना है। मंत्री Piyush Goyal कई बार कह चुके हैं कि ट्रेड डील तभी कारगर है जब भारतीय एक्सपोर्टर्स को वियतनाम, बांग्लादेश, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बढ़त मिले। टेक्सटाइल, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों को फिलहाल कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और बिना किसी बेहतर टैरिफ स्ट्रक्चर के, भारतीय कंपनियां इन देशों से मुकाबला करने में पीछे रह जाती हैं।
मार्केट पर असर और रिस्क
फिलहाल, टैरिफ नीतियों में अस्थिरता भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ा रिस्क है। अनिश्चितता के कारण कंपनियां अपनी प्रोडक्शन प्लानिंग और लॉन्ग-टर्म सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स पर फैसला नहीं ले पा रही हैं। अगर मिलवॉकी की बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता है, तो एक्सपोर्ट सेंटीमेंट पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश टैरिफ गैप को पाट पाएंगे, या फिर यह अनिश्चितता और लंबी खिंचेगी।
