भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते ने अब कानूनी ड्राफ्टिंग (Legal Drafting) का दौर शुरू कर लिया है, वहीं यूरोपियन यूनियन के साथ भी दिसंबर तक डील फाइनल होने की उम्मीद है। यह कदम भारत की ग्लोबल एक्सपोर्ट मार्केट में पैठ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर दो बड़ी उपलब्धियां हासिल करने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने गुरुवार को जानकारी दी कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का शुरुआती चरण अब कानूनी ड्राफ्टिंग के स्तर तक पहुंच गया है। सरकार यह सुनिश्चित करने में जुटी है कि इस डील से भारतीय एक्सपोर्टर्स को अन्य देशों के मुकाबले स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिले। अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों की जटिल अर्थव्यवस्थाओं के बावजूद बातचीत की प्रक्रिया बेहद प्रभावी रही है।
टेक्नोलॉजी और निवेश का मजबूत आधार
अमेरिका के साथ बढ़ते आर्थिक रिश्तों को माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft), गूगल (Google), एडोब (Adobe) और माइक्रोन (Micron) जैसी दिग्गज कंपनियों के भारी निवेश का साथ मिल रहा है। नीति निर्माता इसे रोजगार सृजन और इनोवेशन के रूप में देख रहे हैं। व्यापार के अलावा रक्षा और उभरती हुई टेक्नोलॉजी (Emerging Tech) में भी रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) की आगामी यात्रा इन कमर्शियल पार्टनरशिप्स को और पुख्ता कर सकती है।
यूरोपियन यूनियन (EU) के साथ व्यापारिक प्रगति
यूरोपियन यूनियन के साथ भी बातचीत पटरी पर है। नेगोशिएटर्स दिसंबर तक औपचारिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर करने की तैयारी में हैं। अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो यह समझौता फरवरी या मार्च 2027 तक लागू हो सकता है। यह भारत की उन रणनीतियों का हिस्सा है जिससे वह अपनी निर्भरता को एक बाजार तक सीमित न रखकर अलग-अलग क्षेत्रों में फैला सके।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को इन समझौतों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि ये भारत की एक्सपोर्ट क्षमता के संकेत हैं। आईटी, फार्मास्युटिकल्स, इंजीनियरिंग और टेक्सटाइल जैसे सेक्टर पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। बाजार अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए है कि टैरिफ में कटौती और मार्केट एक्सेस को लेकर अंतिम समझौते में क्या शर्तें सामने आती हैं।
