भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड डील की बातचीत फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है। इंपोर्ट टैरिफ लिमिट और चुनावी माहौल को लेकर बनी असहमति के कारण दोनों देश किसी बड़े समझौते पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।
बातचीत क्यों रुकी?
ट्रेड डील में सबसे बड़ा अड़चन 18% के इंपोर्ट टैरिफ कैप को लेकर है। अमेरिका इसे लागू करने का दबाव बना रहा है, जबकि भारत का कहना है कि मौजूदा 10% के लेवल के मुकाबले यह किसी भी तरह से व्यावहारिक नहीं है। भारत सरकार इसे अपने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मान रही है और इस सीलिंग पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
राजनीतिक दबाव और चुनाव का असर
अमेरिका में आने वाले मिड-टर्म चुनावों के कारण राजनीतिक समीकरण भी जटिल हो गए हैं। अमेरिकी प्रशासन वहां के कुछ राज्यों में समर्थन पाने के लिए कृषि क्षेत्र में रियायतें मांग रहा है। वहीं, नई दिल्ली घरेलू स्तर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को लेकर काफी सतर्क है, क्योंकि चुनाव से ठीक पहले अमेरिकी किसानों को लाभ पहुंचाना भारत के लिए संवेदनशील मुद्दा है।
लंबी अवधि की चिंताएं
टैरिफ के अलावा, भारत को रेगुलेटरी अनिश्चितता की भी चिंता है। सरकार चाहती है कि भविष्य में रूस पर संभावित प्रतिबंधों या अन्य जांचों से भारतीय व्यवसायों को सुरक्षा की गारंटी मिले। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा 'रेसिप्रोकल टैरिफ' को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अमान्य घोषित करने से फरवरी में बना पूरा फ्रेमवर्क अब बेकार हो गया है।
निवेशकों के लिए टेकअवे
निवेशकों के लिए फिलहाल 'स्टेटस को' (Status Quo) की स्थिति बनी रहेगी। अमेरिकी मार्केट पर निर्भर भारतीय कंपनियों को मौजूदा रेगुलेटरी नियमों के तहत ही काम करना होगा। अब बातचीत के दोबारा शुरू होने की उम्मीद अमेरिकी चुनावों के नतीजों के बाद ही जताई जा रही है, तब तक यह ट्रेड डील अनिश्चित काल के लिए टल गई है।
