यह ट्रेड पैक्ट, जिसमें अमेरिकी आयात शुल्क (import duty) को 50% से घटाकर 18% किया गया है, अब एनर्जी जियोपॉलिटिक्स के इर्द-गिर्द घूम रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति (President) ने दावा किया कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा और इसके बजाय अमेरिका या वेनेज़ुएला से आयात बढ़ाएगा। लेकिन, क्रेमलिन (Kremlin) ने साफ किया कि उन्हें नई दिल्ली से ऐसा कोई आधिकारिक संदेश नहीं मिला है।
वहीं, भारत के वाणिज्य मंत्री (Trade Minister) ने टैरिफ में कमी की तो पुष्टि की, लेकिन किसी विशेष देश से तेल की खरीद रोकने जैसे ऊर्जा स्रोतों को बदलने पर कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी। यह विरोधाभास (divergence) बाज़ार में काफी हलचल मचा रहा है, खासकर ऐसे देश के लिए जो अपनी कच्चे तेल (crude oil) की ज़रूरत का करीब 88% आयात करता है। इस अनिश्चितता के कारण सप्लाई (supply) और वास्तविक बदलावों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, जिससे ऑयल की कीमतों में उथल-पुथल बढ़ सकती है।
भारत की कच्चे तेल की आयात पर भारी निर्भरता, जो लगभग 87-90% है, देश की आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत अहम है। 2022 के बाद भारत ने रूस से मिलने वाली बड़ी छूट के कारण वहाँ से तेल खरीदना बढ़ाया था, जिस पर पहले अमेरिकी पैनाल्टी टैरिफ (punitive tariffs) लग चुके थे। दूसरी ओर, यूरोपियन यूनियन (EU) जैसे बड़े देश 2027 तक रूसी जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने पर काम कर रहे हैं। चीन भी बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीद रहा है, लेकिन अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और सामरिक संबंधों को साध रहा है।
2026 में कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में गिरावट का अनुमान है, जहां ब्रेंट क्रूड (Brent crude) का औसत भाव $56 प्रति बैरल रह सकता है। यह भारत के लिए बेहतर शर्तों पर डील करने का मौका हो सकता है, लेकिन यह खरीद फैसलों को और जटिल बना देगा। विश्लेषकों का मानना है कि यह यूएस-इंडिया ट्रेड डील द्विपक्षीय संबंधों में एक नई शुरुआत है, लेकिन विरोधाभासी बयानों से साफ है कि भारत, अमेरिका से आर्थिक फायदे लेने और अपने ऊर्जा साझेदारों के साथ संबंधों को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत की आर्थिक ग्रोथ भी दमदार है, FY25-26 के लिए GDP ग्रोथ 7.5-7.8% रहने का अनुमान है, जिससे ऊर्जा की मांग और बढ़ेगी।
आगे चलकर, भारत को बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और घरेलू मांग को पूरा करने के बीच अपनी एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) को मजबूत करना होगा। इस ट्रेड डील की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एनर्जी इंपोर्ट (Energy Import) को लेकर कितने स्पष्ट कदम उठाए जाते हैं। ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना लंबे समय के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसके लिए मौजूदा सप्लाई चेन (supply chain) और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को सावधानी से संभालना होगा। भारत का लक्ष्य तकनीकी विकास (technological advancements) और बायोएनर्जी (bioenergy) जैसे वैकल्पिक स्रोतों से ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना है, जो भविष्य की अस्थिरता को कम करने में मदद करेगा।
