भारत-यूके ट्रेड पैक्ट लागू होने के दो महीने बाद ही एक्सपोर्टर्स को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कॉमर्स मिनिस्ट्री अब इंडस्ट्री लीडर्स के साथ मीटिंग कर 'Rules of Origin' और अन्य कागजी पेचीदगियों को सुलझाने पर काम कर रही है।
भारत और यूके के बीच 15 जुलाई 2026 को लागू हुए ट्रेड एग्रीमेंट की समीक्षा के लिए कॉमर्स मिनिस्ट्री ने स्टेकहोल्डर्स के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं। हालांकि यह डील भारतीय माल के लिए बड़े दरवाजे खोलती है, लेकिन जमीनी स्तर पर एक्सपोर्टर्स को काफी संघर्ष करना पड़ रहा है।
क्या है असली विवाद?
सबसे बड़ी चुनौती 'Rules of Origin' की है। ड्यूटी-फ्री बेनिफिट्स का दावा करने के लिए भारतीय कंपनियों को यह साबित करना पड़ता है कि उनका सामान भारत में ही बना है या प्रोसेस हुआ है। इसके लिए लंबी कागजी प्रक्रिया और सर्टिफिकेशन की जरूरत होती है। बड़ी कंपनियों के पास तो इसके लिए टीमें हैं, लेकिन MSMEs (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) के लिए यह प्रक्रिया काफी महंगी और जटिल साबित हो रही है।
कितना बड़ा है दांव?
यह एग्रीमेंट 99% भारतीय एक्सपोर्ट्स को जीरो-ड्यूटी एक्सेस देता है, जिसमें टेक्सटाइल, लेदर, इंजीनियरिंग गुड्स और ज्वैलरी जैसे प्रमुख सेक्टर शामिल हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर में दोनों देशों के बीच गुड्स ट्रेड $25.12 बिलियन का था, जिसे अब बढ़ाकर $32 बिलियन से ऊपर ले जाने का लक्ष्य है। इसके अलावा, 'Double Contribution Convention' के तहत भारतीय प्रोफेशनल्स को 5 साल तक सोशल सिक्योरिटी कॉन्ट्रिब्यूशन से छूट भी दी गई है।
आगे की चुनौतियां
केवल डॉक्यूमेंटेशन ही नहीं, बल्कि UK Steel Safeguard और आने वाला CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) भी भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए चिंता का विषय है। ये नए नियम ट्रेड पैक्ट से मिलने वाले टैरिफ लाभों को बेअसर कर सकते हैं। सरकार की यह समीक्षा इस बात पर केंद्रित है कि कैसे इन प्रशासनिक बाधाओं को दूर करके एक्सपोर्ट ग्रोथ को रफ्तार दी जाए। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार MSMEs के लिए नियमों में कोई ढील देगी या नहीं।
