भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) आज यानी 15 जुलाई से लागू हो गया है। इस डील के तहत भारतीय सामानों को ब्रिटिश मार्केट में 99% तक ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा, जिससे एक्सपोर्ट को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए 99% ड्यूटी-फ्री एक्सेस
इस नए समझौते का सबसे बड़ा फायदा भारतीय निर्यातकों को होगा, जिन्हें अब ब्रिटेन के बाज़ारों में अपने उत्पाद बेचने के लिए 99% तक की छूट मिलेगी। इस कदम से भारतीय सामानों के एक्सपोर्ट को बड़ी तेज़ी मिलने की संभावना है। अब तक US$140 मिलियन के एक्सपोर्ट कंसाइनमेंट भेजे जा चुके हैं। सेवाओं के क्षेत्र में भी एक अहम प्रावधान है - डबल कॉन्ट्रिब्यूशन कन्वेंशन (Double Contribution Convention)। इसके तहत, यूके में काम करने वाले भारतीय पेशेवर अगले 5 सालों तक दोहरे सामाजिक सुरक्षा भुगतान से बच सकते हैं।
ट्रेड डेफिसिट और डोमेस्टिक इंडस्ट्री पर असर
हालांकि, इस डील के कुछ ऐसे पहलू भी हैं जिन पर आर्थिक विश्लेषक नज़रें गड़ाए हुए हैं। अनुमान है कि जहाँ भारत के एक्सपोर्ट बढ़ेंगे, वहीं यूके के एक्सपोर्ट भारत में और तेज़ी से बढ़ सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले से ही कई ब्रिटिश सामान भारत में कम या बिना किसी टैरिफ के आ रहे थे। दूसरी ओर, भारतीय निर्यातकों को यूके के सख्त रेगुलेटरी और कंप्लायंस नियमों से गुज़रना होगा। इतिहास गवाह है कि ऐसे ट्रेड एग्रीमेंट के बाद अक्सर भारत का ट्रेड डेफिसिट (आयात-निर्यात का अंतर) बढ़ जाता है, क्योंकि डोमेस्टिक कंपनियों के लिए कंप्लायंस का खर्च टैरिफ से होने वाली बचत पर भारी पड़ सकता है।
GST कलेक्शन और 'मेक इन इंडिया' पर खतरा?
इस समझौते से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ स्ट्रक्चरल चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं। चिंता इस बात की है कि कहीं 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' (inverted duty structure) तो नहीं बन जाएगा, जहाँ इम्पोर्टेड फिनिश्ड गुड्स पर ड्यूटी कम हो और भारत में बनने वाले माल के रॉ मटेरियल पर टैक्स ज़्यादा। इससे भारत में प्रोडक्शन करना महंगा हो सकता है, जो सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान के विपरीत जा सकता है।
साथ ही, ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट बढ़ने से GST कलेक्शन पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि इम्पोर्ट पर कस्टम ड्यूटी कम होने से टैक्स रेवेन्यू का बेस घट सकता है। यह डील यूके की कंपनियों को भारतीय सरकारी खरीद (government procurement) में भी कम लोकल कंटेंट ज़रूरतों के साथ भाग लेने की अनुमति देती है, जिससे डोमेस्टिक बिज़नेस के लिए कॉम्पिटिशन बढ़ेगा। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कॉम्पिटिशन इंडस्ट्री की एफिशिएंसी बढ़ाएगा, लेकिन दूसरों को चिंता है कि पर्यावरण, बौद्धिक संपदा और डिजिटल ट्रेड जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप घरेलू कानूनों को बदलने से सरकार की पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी कम हो सकती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों को इस डील के लॉन्ग-टर्म असर पर नज़र रखनी चाहिए, खासकर देश के ट्रेड डेफिसिट और स्पेसिफिक सेक्टर्स पर। डोमेस्टिक टैरिफ पॉलिसी में संभावित बदलाव, इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना और डोमेस्टिक प्रोक्योरमेंट को सुरक्षित रखने के सरकारी प्रयासों पर खास ध्यान देना होगा। भविष्य में आने वाले ट्रेड डेटा और मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट से यह तस्वीर साफ होगी कि यह समझौता भारतीय इंडस्ट्री के विकास में मददगार साबित होता है या उस पर दबाव बढ़ाता है।
