भारत और ब्रिटेन के बीच हुए नए ट्रेड एग्रीमेंट के बाद भारतीय फूड एक्सपोर्टर्स के लिए मौके बढ़ गए हैं। श्रिम्प और कॉफी जैसे प्रोडक्ट्स पर टैरिफ हटने से निर्यातकों को बड़ा फायदा होगा, हालांकि निवेशकों को अब कंपनियों के मार्जिन और क्वालिटी मानकों पर नजर रखनी होगी।
टैरिफ हटने से बढ़ी कॉम्पिटिटिवनेस
15 जुलाई से लागू हुए 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट' (CETA) के बाद भारतीय फूड और बेवरेज सेक्टर के लिए ब्रिटेन का बाजार खुल गया है। अब तक भारतीय एक्सपोर्टर्स को ब्रिटेन के $50.68 अरब के फूड इंपोर्ट मार्केट में सिर्फ 0.6% की हिस्सेदारी हासिल थी, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।
नए एग्रीमेंट के तहत श्रिम्प पर लगने वाला 8.5% का शुल्क और कुछ प्रोसेस्ड फूड पर लगने वाला 70% तक का भारी भरकम ड्यूटी खत्म कर दिया गया है। इससे Apex Frozen Foods, Avanti Feeds, Coastal Corporation और CCL Products जैसी कंपनियों के लिए अपने मार्जिन सुधारने या मार्केट शेयर बढ़ाने का मौका बन गया है।
क्वालिटी की अग्निपरीक्षा
टैरिफ हटने के बावजूद चुनौतियां बरकरार हैं। ब्रिटेन के बाजार में 'सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी' (SPS) स्टैंडर्ड्स काफी सख्त हैं। अगर भारतीय कंपनियां इन क्वालिटी मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं, तो शिपमेंट रिजेक्ट होने का रिस्क बना रहेगा। इसके अलावा, वियतनाम और इक्वाडोर जैसे देशों से मिलने वाली सस्ती चुनौती भी भारतीय कंपनियों की राह आसान नहीं होने देगी।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को अब कंपनियों के आगामी तिमाही नतीजों (Quarterly Results) पर नजर रखनी चाहिए। देखना होगा कि क्या यह ट्रेड डील सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या वाकई कंपनियों के वॉल्यूम और प्रॉफिट मार्जिन में बड़ा बदलाव लाती है। Trade Promotion Council of India और UK-India Business Council का गठजोड़ छोटी कंपनियों को नई राह जरूर दिखा सकता है, लेकिन असली गेम कंपनियों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर टिका है।
