भारत का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) अब एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। कच्चे तेल (Crude Oil) की जगह इलेक्ट्रॉनिक्स इम्पोर्ट्स अब देश के व्यापार घाटे का नया केंद्र बन गए हैं। जहां डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन महज **20%** है, वहीं सरकार ने स्थिति सुधारने के लिए **₹62,500 करोड़** की नई मैन्युफैक्चरिंग स्कीम का ऐलान किया है।
बदलता ट्रेड लैंडस्केप
भारत के व्यापारिक आंकड़ों में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव देखने को मिल रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में कुल ट्रेड डेफिसिट $334 बिलियन रहा, जिसमें से $120 बिलियन का हिस्सा पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का था। लेकिन असली चिंता का विषय अब इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल इनपुट्स बन गए हैं, जिनका नॉन-पेट्रोलियम डेफिसिट में योगदान लगातार बढ़ रहा है।
क्यों है चिंता की बात?
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में व्यापार घाटा $69 बिलियन तक पहुंच चुका है, जो कुल ट्रेड डेफिसिट का 20% है। चुनौती यह है कि भारत में मोबाइल जैसे हार्डवेयर की असेंबली तो बढ़ रही है, लेकिन असल में वैल्यू एडिशन अभी भी 18% से 20% के बीच ही अटका हुआ है। इसका मतलब है कि डिवाइस का 'दिमाग' कहे जाने वाले सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले पैनल जैसे पार्ट्स हम भारी मात्रा में इम्पोर्ट कर रहे हैं। वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की कुल सप्लाई का 30% हिस्सा इम्पोर्ट से आ रहा है, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन में किसी भी हलचल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
सरकार का 'गेम-चेंजर' प्लान
इस खाई को पाटने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 21 अगस्त, 2026 को एक नई 'मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम' नोटिफाई की है। ₹62,500 करोड़ के आउटले वाली यह स्कीम 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी। इसका मुख्य लक्ष्य लोकल कंपोनेंट सोर्सिंग को बढ़ावा देना है ताकि भारत केवल 'असेंबली हब' न रहकर एक 'मैन्युफैक्चरिंग हब' बन सके।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
इन्वेस्टर्स को अब यह देखना होगा कि कंपनियां इस नई स्कीम का कितना फायदा उठाती हैं। जब तक स्थानीय स्तर पर कंपोनेंट इकोसिस्टम तैयार नहीं होता, तब तक कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर इम्पोर्ट कॉस्ट का दबाव बना रहेगा। फिलहाल, लोकल मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार ही इस सेक्टर के शेयरों और ट्रेड बैलेंस की दिशा तय करेगी।
