विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए Union Cabinet ने Model Bilateral Investment Treaty (BIT) में बदलाव का फैसला किया है। 2015 के पुराने ढांचे को बदलकर अब नियमों को ज्यादा इन्वेस्टर-फ्रेंडली बनाया जा रहा है, ताकि देश में कैपिटल फ्लो को रफ्तार मिल सके।
भारत सरकार अपनी इकोनॉमिक डिप्लोमेसी के तहत एक नया Model Bilateral Investment Treaty (BIT) पेश करने की तैयारी कर रही है। यह बदलाव 2015 के उस पुराने फ्रेमवर्क की जगह लेगा, जिस पर लंबे समय से ग्लोबल ट्रेड पार्टनर्स के साथ चर्चा चल रही थी। सरकार का मुख्य मकसद भारत में निवेश के लिए एक भरोसेमंद माहौल बनाना है।
2015 के नियमों में क्यों पड़ा बदलाव?
पुराने नियमों के मुताबिक, किसी भी अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन (Arbitration) में जाने से पहले विदेशी निवेशकों को कम से कम 5 साल तक भारतीय अदालतों में अपना केस लड़ना अनिवार्य था। ग्लोबल इन्वेस्टर्स का तर्क था कि यह प्रक्रिया काफी लंबी और अनिश्चित है। अब इस प्रक्रिया को आसान बनाने पर काम हो रहा है ताकि लंबे समय के लिए ग्लोबल कैपिटल भारत आ सके।
राष्ट्र की संप्रभुता सर्वोपरि
निवेशकों को लुभाने के बावजूद सरकार ने साफ कर दिया है कि टैक्स और ज्यूडिशियल प्रोसेस (न्यायिक प्रक्रिया) अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन के दायरे से बाहर रहेंगे। इसका मतलब है कि देश की टैक्स पॉलिसी पर सरकार का पूरा हक बना रहेगा और वे कानूनी उलझनों से बच सकेंगे।
भारतीय कंपनियों को भी फायदा
यह नया बदलाव सिर्फ बाहरी निवेश के लिए नहीं है, बल्कि यह उन भारतीय कंपनियों के लिए भी सुरक्षा कवच का काम करेगा जो UAE, इजरायल और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में विस्तार कर रही हैं। यह 'First Develop India' पहल के तहत घरेलू कंपनियों को ग्लोबल मार्केट में मजबूती देने का एक बड़ा हिस्सा है।
निवेशकों के लिए बड़ी सीख
यह नया मॉडल यूनाइटेड किंगडम और कनाडा जैसे बड़े देशों के साथ चल रही ट्रेड डील के लिए एक टेम्पलेट का काम करेगा। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि सरकार कितनी तेजी से इन नए द्विपक्षीय समझौतों (Bilateral Agreements) पर हस्ताक्षर करती है, क्योंकि यही भारत में आने वाले फंड्स की स्थिरता तय करेगा।
