सरकार की **₹1.27 लाख करोड़** वाली Semicon 2.0 स्कीम के तहत अब नियम सख्त हो गए हैं। कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने तक कंपनियां अपनी संपत्ति न तो बेच पाएंगी और न ही गिरवी रख सकेंगी।
भारत सरकार ने देश के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूती देने के लिए Semicon 2.0 स्कीम के तहत नई गाइडलाइंस जारी की हैं। सरकार का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्रोजेक्ट्स में आने वाली कंपनियां लॉन्ग-टर्म मैन्युफैक्चरिंग के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहें।
एसेट और ओनरशिप पर लगाम
नई पॉलिसी के तहत, इंसेंटिव लेने वाली कंपनियां कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू होने तक अपनी किसी भी प्रोजेक्ट एसेट को बेच नहीं सकेंगी। इतना ही नहीं, इन संपत्तियों को गिरवी रखने या उन पर कोई लीन (Lien) बनाने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इससे कंपनियां शुरुआती दौर में इन एसेट्स को कोलैटरल (Collateral) के तौर पर इस्तेमाल कर कर्ज नहीं जुटा पाएंगी।
इसके अलावा, सरकार ने ओनरशिप स्ट्रक्चर को लेकर भी सख्ती दिखाई है। आवेदकों को पूरी सपोर्ट अवधि के दौरान और कमर्शियल ऑपरेशंस शुरू होने के 3 साल बाद तक कम से कम 51% इक्विटी शेयर कैपिटल और वोटिंग राइट्स बनाए रखने होंगे। अगर कंपनी ओनरशिप में कोई भी बदलाव करना चाहती है, तो उसे पहले नोडल एजेंसी से मंजूरी लेनी होगी।
इन खर्चों पर नहीं मिलेगा इंसेंटिव
सरकार ने स्पष्ट किया है कि इंसेंटिव का लाभ केवल कोर मैन्युफैक्चरिंग मशीनरी और फिजिकल फैसिलिटी कंस्ट्रक्शन पर मिलेगा। जमीन अधिग्रहण, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) से जुड़े खर्चों को एलिजिबल कैपिटल एक्सपेंडिचर में शामिल नहीं किया जाएगा।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
ये नियम साफ तौर पर बताते हैं कि सरकार उन कंपनियों को प्राथमिकता दे रही है जो लंबी रेस के घोड़े हैं। जो कंपनियां बार-बार फंड जुटाने या ओनरशिप बदलकर तेजी से पैसा बनाने के मॉडल पर काम कर रही थीं, उनके लिए एंट्री बैरियर बढ़ गया है। निवेशकों के लिए अब कंपनियों का फंडामेंटल फंडिंग मॉडल और उनकी लॉन्ग-टर्म स्टेबिलिटी को ट्रैक करना सबसे अहम होगा।
