2023-24 के लेटेस्ट टैक्स डेटा ने भारतीय बाजार में आमदनी के बड़े फासले को उजागर किया है। लगभग **50%** टैक्सपेयर्स की सालाना कमाई **₹5 लाख** से कम है, जिसके चलते कंपनियां अब 'मास-मार्केट' और 'प्रीमियम' के बीच अपना बिजनेस मॉडल तेजी से बदल रही हैं।
2023-24 के इनकम टैक्स फाइलिंग डेटा ने भारत की आर्थिक तस्वीर साफ कर दी है। देश में करीब 7.5 करोड़ टैक्सपेयर्स के बेस में से लगभग 50% लोग ₹5 लाख से कम कमाते हैं, जो कुल आय का मात्र 21% हिस्सा ही कंट्रीब्यूट करते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि बड़ी आबादी महंगाई और जरूरी सामानों की बढ़ती कीमतों के प्रति कितनी संवेदनशील है।
मास-मार्केट का संघर्ष
दैनिक उपभोग (FMCG) और स्टेपल्स बेचने वाली कंपनियों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। इन कंपनियों की ग्रोथ वॉल्यूम पर निर्भर करती है, लेकिन कम आय वाले वर्ग की क्रय शक्ति सीमित होने के कारण कीमतों में बढ़ोतरी करना इनके लिए मुश्किल हो रहा है। ऐसे में इन कंपनियों का पूरा जोर लागत घटाने (Cost-cutting) और वितरण नेटवर्क को मजबूत करने पर है।
प्रीमियम की ओर शिफ्ट
इसके विपरीत, देश का 0.3% सबसे अमीर वर्ग कुल राष्ट्रीय आय का 10% से अधिक हिस्सा होल्ड करता है। यही कारण है कि आज भारत में 'प्रीमियमाइजेशन' (Premiumization) की लहर चल रही है। चाहे लग्जरी गाड़ियां हों, महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स या रियल एस्टेट, कंपनियां अब अपनी रणनीति इसी वर्ग को टारगेट करने के लिए बदल रही हैं। यह वर्ग आर्थिक उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होता है और कंपनियों को बेहतर मार्जिन (Margin) देता है।
निवेशकों के लिए टेक-अवे
हालिया कॉर्पोरेट नतीजों में यह साफ देखा जा सकता है कि जो कंपनियां प्रीमियम सेगमेंट पर ध्यान दे रही हैं, उनका मुनाफा बेहतर है, जबकि मास-मार्केट पर टिकी कंपनियां वॉल्यूम ग्रोथ के लिए संघर्ष कर रही हैं। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि शहरी खपत और क्रेडिट ग्रोथ का ट्रेंड भविष्य में कैसा रहता है, क्योंकि यही अगले दौर के विनर डिसाइड करेगा।
