भारत में टैक्स फाइल करने वालों की संख्या, खासकर ₹10-50 लाख की कमाई वाले ब्रैकेट में, पिछले 10 सालों में 7 गुना बढ़ गई है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस दौरान महंगाई के चलते उनकी असली कमाई यानी खरीदने की क्षमता करीब 40% घट गई है। ये बताता है कि ज़्यादा लोग टैक्स के दायरे में तो आए हैं, पर उनकी जेब पर बोझ बढ़ा है। वहीं, असंगठित क्षेत्र में भी कमाई घट रही है।
टैक्स के दायरे में ज़्यादा लोग, पर असल कमाई घटी
आयकर विभाग के नए आंकड़े बताते हैं कि भारत की फॉर्मल इकोनॉमी में बड़ा बदलाव आया है। पिछले 10 सालों (2012-13 से 2022-23) में, ₹10 लाख से ₹50 लाख सालाना कमाने वालों की संख्या 7 गुना से ज़्यादा बढ़ गई है। अब ये लोग कुल रिपोर्टेड सैलरी इनकम का लगभग 50% हिस्सा हैं, जबकि 10 साल पहले ये सिर्फ 25% थे। ये बताता है कि ज़्यादा लोग अब टैक्स फाइल कर रहे हैं, पर उनकी असली आर्थिक स्थिति क्या है?
महंगाई का मार: 40% कम हुई खरीदने की ताकत
टैक्स भरने वालों की संख्या बढ़ने के बावजूद, इस मिडिल क्लास ग्रुप की औसत सैलरी में ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। 10 साल पहले जहां औसत सैलरी ₹16.86 लाख थी, वहीं अब यह सिर्फ ₹17.33 लाख है। पिछले एक दशक में महंगाई बहुत ज़्यादा बढ़ी है, जिससे लोगों की खरीदने की असली क्षमता (purchasing power) लगभग 40% कम हो गई है। इसका मतलब है कि ये लोग अपनी ज़रूरतें पूरी करने में ही ज़्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं, जिससे लग्जरी या नॉन-एसेंशियल चीज़ों पर खर्च कम हो गया है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि मिडिल क्लास के लोग अब सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं।
असंगठित क्षेत्र का हाल बेहाल
देश की कुल वर्कफोर्स का लगभग 90.3% हिस्सा अभी भी असंगठित (informal) क्षेत्र में काम करता है। 2011-12 के मुकाबले 2022 में असंगठित क्षेत्र में रोज़गार सिर्फ मामूली रूप से कम हुआ है (92.2% से 90.3%)।
इस क्षेत्र में कमाई और भी ज़्यादा अनिश्चित है। कैज़ुअल वर्कर्स की हर महीने की असली कमाई सिर्फ थोड़ी बढ़कर ₹4,712 हुई है, और इनमें से करीब 78% लोग हर महीने ₹7,500 से कम कमा रहे हैं। वहीं, सेल्फ-एम्प्लॉयड लोगों की असली कमाई 2019 में ₹7,017 से घटकर 2022 में ₹6,843 रह गई। ज़्यादा लोग सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट की ओर बढ़ रहे हैं, जिनमें बिना पैसे के काम करने वाले फैमिली वर्कर्स भी शामिल हैं। यह दिखाता है कि लोग अच्छी नौकरियों के बजाय कम सुरक्षित काम करने को मजबूर हैं।
अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती
ये आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती पेश करते हैं। एक तरफ, टैक्स बेस का बढ़ना सरकारी रेवेन्यू के लिए अच्छा है, लेकिन दूसरी तरफ, मिडिल क्लास की सैलरी में बढ़ोतरी न होना और असंगठित क्षेत्र में कम कमाई, डोमेस्टिक कंजम्पशन यानी घरेलू खपत की ग्रोथ को धीमा कर सकती है। एफएमसीजी (FMCG), रिटेल और ऑटोमोबाइल जैसे कंज्यूमर-फेसिंग सेक्टर के निवेशकों को आने वाले समय में इस आय के दबाव का असर कंज्यूमर डिमांड और ब्रांड लॉयल्टी पर देखना होगा। लंबी अवधि में इन सेक्टरों की परफॉरमेंस इस बात पर निर्भर करेगी कि असली वेज ग्रोथ महंगाई से आगे निकल पाती है या नहीं और क्या फॉर्मल इकोनॉमी ज़्यादा लोगों को अच्छी नौकरियों में शामिल कर पाती है।
