भारत ने फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में **$480 बिलियन** का एक्सपोर्ट दर्ज किया है, जो देश को **$1 ट्रिलियन** के लक्ष्य की ओर ले जा रहा है। हालांकि, सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बड़े सुधारों का संकेत दिया है, जिससे निवेशकों को भविष्य में कंपनी के प्रदर्शन पर नजर रखनी होगी।
भारत इस फाइनेंशियल ईयर में एक्सपोर्ट के $1 ट्रिलियन के जादुई आंकड़े को छूने की तैयारी कर रहा है। वित्त वर्ष की पहली छमाही में $480 बिलियन के आंकड़े ने इस लक्ष्य की नींव मजबूत कर दी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने साफ किया है कि इस मोमेंटम को बनाए रखने के लिए अब घरेलू मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव जरूरी हैं।\n\n### मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्टिविटी पर फोकस\n\nमैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में निवेश करने वालों के लिए सरकार की पॉलिसी अब बदल रही है। ग्रॉस वैल्यू एडेड में 9.2% की ग्रोथ के बावजूद, इकोनॉमी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान अभी 14.8% के आसपास बना हुआ है। सरकार अब परमानेंट प्रोटेक्शन के बजाय 'परफॉर्मेंस-लिंक्ड' सपोर्ट पर जोर दे रही है। यानी भविष्य में सिर्फ उन्हीं कंपनियों को सरकारी मदद मिलेगी जो ग्लोबल स्तर पर अपनी प्रोडक्टिविटी और कॉम्पिटिशन में खरी उतरेंगी।\n\n### ट्रेड डेफिसिट और इंपोर्ट का दबाव\n\nग्लोबल सप्लाई चेन में जारी अस्थिरता ने चिंताएं बढ़ाई हैं। आंकड़ों के मुताबिक, कोर मर्चेंडाइज इंपोर्ट में 19.7% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि एक्सपोर्ट ग्रोथ 16.2% रही है। यह अंतर ट्रेड डेफिसिट पर दबाव बना रहा है। महंगे इंपोर्ट और ग्लोबल सप्लाई चेन के जोखिमों के बीच, अब नेशनल इकोनॉमिक रेजिलिएंस के लिए कमोडिटी सप्लाई पर ध्यान देना सरकार की पहली प्राथमिकता है।\n\nनिवेशकों को अब उन सेक्टर्स पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए जो इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भर हैं। बढ़ती ट्रेड डेफिसिट का असर करेंसी स्टेबिलिटी और कंपनी के लागत पर पड़ सकता है। आने वाले समय में बाजार की नजर इस बात पर होगी कि कैसे घरेलू इंडस्ट्रीज अपनी कार्यकुशलता बढ़ाकर ग्लोबल निर्भरता को कम करती हैं।
