भारत सरकार ने आत्मनिर्भरता की दिशा में दो बड़े कदम उठाए हैं। **₹91,000 करोड़** के बजट के साथ Rare-Earth मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग और गहरे समुद्र में तेल-गैस की खोज को बढ़ावा देने की योजना लॉन्च की गई है, जिससे इलेक्ट्रिक व्हीकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री को नई मजबूती मिलेगी।
भारत अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए अब 'आत्मनिर्भरता' की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी संकेत दिया है कि ये स्ट्रक्चरल बदलाव ग्लोबल इकोनॉमी में भारत की स्थिति को मजबूत करेंगे और सप्लाई शॉक के खतरों को कम करेंगे।
Rare-Earth मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग
नवंबर 2025 में सरकार ने ₹7,280 करोड़ की एक महत्वाकांक्षी स्कीम को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य देश में ही सिंटर्ड Rare Earth Permanent Magnets (REPMs) का निर्माण करना है। भले ही भारत के पास दुनिया के तीसरे सबसे बड़े Rare-Earth रिजर्व हैं, लेकिन हम वैश्विक उत्पादन का 1% से भी कम प्रोसेस करते हैं। इस स्कीम के जरिए 6,000 MTPA की प्रोडक्शन क्षमता बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें Vedanta, Hindustan Zinc, NLC India, Sona Comstar और Larsen & Toubro जैसी बड़ी कंपनियों की रुचि देखी जा रही है, हालांकि टेक्नोलॉजी की कमी एक बड़ा चैलेंज बनी हुई है।
'समुद्र मंथन' (Samudra Manthan) का आगाज
Rare-Earth के साथ-साथ सरकार ने जुलाई 2026 में 'समुद्र मंथन' नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को हरी झंडी दी है। ₹84,084 करोड़ की लागत वाली यह योजना फाइनेंशियल ईयर 2030-31 तक चलेगी। इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र के उन इलाकों में तेल और गैस की खोज करना है, जो अब तक पहुंच से बाहर थे।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को यह समझना होगा कि ये प्रोजेक्ट्स तुरंत मुनाफा देने वाले नहीं, बल्कि लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक निवेश हैं। कच्चे माल के लिए अभी भी विदेशों पर निर्भरता बनी हुई है, जो मैन्युफैक्चरिंग के लाभ को सीमित कर सकती है। साथ ही, डीप-वॉटर एक्सप्लोरेशन में रिस्क और लागत काफी ज्यादा होती है। निवेशकों को प्रोडक्शन फैसिलिटीज के कमीशनिंग और टेक्नोलॉजी हासिल करने की दिशा में कंपनियों की प्रगति पर बारीक नजर रखनी चाहिए।
