Japan-India Investment: जापानी बैंकों से निवेश जुटाने की बड़ी तैयारी, 2035 तक **10 ट्रिलियन येन** का लक्ष्य

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Japan-India Investment: जापानी बैंकों से निवेश जुटाने की बड़ी तैयारी, 2035 तक **10 ट्रिलियन येन** का लक्ष्य

भारत अब जापान के क्षेत्रीय बैंकों और छोटी कंपनियों को निवेश के लिए साध रहा है। सरकार का लक्ष्य **2035** तक **10 ट्रिलियन येन** का निवेश हासिल करना है, हालांकि जापानी कंपनियां अभी भी रेगुलेटरी चुनौतियों और करेंसी रिस्क को लेकर सतर्क हैं।

भारत सरकार ने जापान के फाइनेंशियल सेक्टर में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए एक नई रणनीति अपनाई है। अब फोकस सिर्फ बड़े नेशनल लेंडर्स पर नहीं, बल्कि जापान के रीजनल बैंकों और स्मॉल-टू-मीडियम एंटरप्राइजेज (SMEs) पर है। इसका उद्देश्य अगले दशक में जापान से 10 ट्रिलियन येन (करीब $68 बिलियन) का प्राइवेट इन्वेस्टमेंट जुटाना है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में 27 अगस्त, 2026 को हुई चर्चाओं के बाद इस दिशा में तेजी देखी जा रही है।\n\n### रीजनल बैंकिंग की तरफ झुकाव\n\nपहले भारत की निर्भरता जापान के तीन सबसे बड़े फाइनेंशियल संस्थानों पर थी, लेकिन अब रणनीति बदली गई है। जापान के अलग-अलग प्रांतों में मौजूद ये क्षेत्रीय बैंक वहां के स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स से जुड़े हैं, जो अब अपना कामकाज चीन और साउथ-ईस्ट एशिया से हटाकर भारत में शिफ्ट करने पर विचार कर रहे हैं। सरकार मारुति सुजुकी के सफल वेंडर इकोसिस्टम मॉडल को आधार बनाकर सप्लाई चेन पार्टनर्स को भारत लाने की कोशिश कर रही है।\n\n### निवेश का डेटा और चुनौतियां\n\nपिछले 10 महीनों में 15% निवेश लक्ष्य हासिल कर लिया गया है, जो शुरुआती गति को दर्शाता है। हालांकि, राह आसान नहीं है। हालिया बातचीत में जापानी निवेशकों ने भारत में 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को लेकर चिंता जताई है। इनमें प्रॉफिट रिपैट्रिएशन (मुनाफा बाहर ले जाना), करेंसी में उतार-चढ़ाव और ट्रांसफर-प्राइसिंग के जटिल नियम शामिल हैं। साथ ही, शेयर बायबैक या सेकेंडरी सेल जैसे मामलों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की कड़ी स्क्रूटनी भी निवेशकों के लिए देरी का कारण बनती है।\n\n### आगे की राह\n\nनिवेशकों की नजर अब नीतिगत सुधारों पर है। फिलहाल, भारत-जापान कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) के आधुनिकीकरण पर चर्चा चल रही है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार नियमों को कितना सरल बना पाती है ताकि विदेशी कंपनियां आसानी से फंड ट्रांसफर कर सकें।

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